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पश्चिम एशिया संकट पर सर्वदलीय बैठक: Rahul Gandhi ने छोड़ी बैठक, TMC ने बनाई दूरी — क्या विपक्ष एकजुट नहीं?
नई दिल्ली। ईरान-इज़राइल-अमेरिका युद्ध अब केवल मध्य पूर्व की समस्या नहीं रही — इसकी आग की लपटें अब भारत की रसोई तक पहुँच चुकी हैं। पेट्रोल 103, डीजल 90 और LPG सिलेंडर 912 — ये आंकड़े आम आदमी की जेब पर कितना बोझ डाल रहे हैं, यह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं।
यह संघर्ष 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुआ था और अब इसे चार हफ्ते पूरे हो चुके हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने आज 25 मार्च को शाम 5 बजे संसद परिसर के भीतर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस बैठक की अध्यक्षता करने वाले थे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी क्षेत्र की ताज़ा स्थिति पर विस्तृत ब्रीफिंग देने वाले थे।
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जब घर जल रहा हो, तो भी कुछ लोग बाहर रहे
राजनीति की यह विडंबना देखिए — जब पूरा देश ऊर्जा संकट की मार झेल रहा है, तब भी दलगत राजनीति हावी रही। विपक्ष के नेता राहुल गांधी केरल में एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के चलते इस बैठक में शामिल नहीं हो सके। वहीं तृणमूल कांग्रेस ने भी बैठक का बहिष्कार किया। TMC नेता सौगत रॉय ने कहा कि जब संसद में पूरी बहस होनी चाहिए, तब बंद कमरे की बैठक से क्या हासिल होगा?
यह कुछ ऐसा है जैसे किसी मुहल्ले में आग लगी हो और पड़ोसी यह बहस करते रहें कि बाल्टी कौन उठाए।
मोदी का ‘कोविड वाला’ अनुभव
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के दोनों सदनों में इस संकट पर वक्तव्य दिया था। उन्होंने देश से तैयार और एकजुट रहने की अपील की और स्थिति की तुलना कोविड महामारी जैसी लंबी चुनौती से की — यह संकट लंबे समय तक रह सकता है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत में भारी मात्रा में कच्चा तेल, गैस, उर्वरक और अन्य ज़रूरी सामान आता है और अब वहाँ से शिपिंग बेहद कठिन हो गई है।
उन्होंने यह भी बताया कि पिछले 11 वर्षों में भारत ने ऊर्जा आयात के स्रोतों को 27 देशों से बढ़ाकर 41 देशों तक फैलाया है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम हुई है।

3.75 लाख भारतीय — वापसी की राहत
इस युद्ध के शुरू होने के बाद से अब तक 3 लाख 75 हज़ार से अधिक भारतीय सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। ईरान से ही 1,000 से अधिक भारतीय वापस आए हैं, जिनमें 700 से अधिक युवा मेडिकल छात्र शामिल हैं। खाड़ी देशों में CBSE के स्कूलों की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएँ भी स्थगित कर दी गई हैं।
यह भारतीय कूटनीति की उपलब्धि ज़रूर है, लेकिन वहाँ अभी भी करीब एक करोड़ भारतीय रह रहे हैं — और उनकी चिंता किसी भी सरकार के माथे पर बल डालने के लिए काफी है।
विपक्ष का तीखा सवाल — और सरकार की चुप्पी
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री का बयान बहुत देर से आया और इसने जवाब देने की बजाय और सवाल खड़े किए। कांग्रेस ने PM मोदी के संसदीय बयान को “11 साल की आत्म-प्रशंसा से भरा पाठ” करार दिया।
दूसरी तरफ, सरकार ने संसद में इस संकट पर विस्तृत चर्चा की अनुमति देने से इनकार कर दिया है — जबकि विपक्षी दलों ने इसकी माँग हफ्तों पहले ही की थी।
जनतंत्र में सबसे बड़ा मंच संसद है — अगर वहाँ देश की सबसे बड़ी समस्या पर खुलकर बात नहीं होगी, तो बंद कमरे की बैठकें कितना भार उठाएँगी?
भारत की असली चुनौती
आज भारत तीन मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है — ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार मार्गों की बाधा। सरकार होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर भारत के अन्य सामरिक हितों पर विस्तृत ब्रीफिंग देने की कोशिश कर रही है। लेकिन जब तक राजनीतिक दल एकजुट नहीं होंगे, कोई भी राष्ट्रीय रणनीति अधूरी रहेगी।
जैसे क्रिकेट में हर खिलाड़ी अपनी बैटिंग करता रहे और कोई पार्टनरशिप न बने — वैसे ही आज की सर्वदलीय बैठक में दिखा। संकट एक है, लेकिन सुर अलग-अलग।
