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खार्ग द्वीप पर कब्ज़ा, होर्मुज़ पर धावा — अमेरिका ने बना ली है ज़मीनी जंग की पूरी स्क्रिप्ट, बस ट्रंप के एक इशारे का इंतज़ार
पेंटागन ने ईरान के खिलाफ हफ्तों तक चलने वाले ग्राउंड ऑपरेशन की तैयारी पूरी कर ली है — हज़ारों मरीन और स्पेशल फोर्स तैनात, निशाने पर ईरान का 90% तेल निर्यात संभालने वाला द्वीप
वॉशिंगटन/तेहरान — मध्य पूर्व में जारी इस जंग का पाँचवाँ हफ्ता चल रहा है, और अब खबर आई है जो पूरी दुनिया को हिला कर रख सकती है। अमेरिका का पेंटागन ईरान के खिलाफ ज़मीनी सैन्य अभियान की तैयारी में जुटा है। वॉशिंगटन पोस्ट की एक बड़ी रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना में ईरान के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्र — खार्ग द्वीप — पर सीधा हमला और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास के तटीय इलाकों पर रेड शामिल हो सकती है।
हालाँकि इस पूरी योजना पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फैसला अभी बाकी है।
खार्ग द्वीप — ईरान की “तेल धड़कन”
खार्ग द्वीप को समझना ज़रूरी है। यह फारस की खाड़ी में स्थित एक छोटा-सा द्वीप है — आकार में मैनहट्टन के करीब एक-तिहाई — लेकिन इसकी आर्थिक ताकत किसी बड़े शहर से कम नहीं। ईरान के कुल कच्चे तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इसी द्वीप के रास्ते होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर दुनिया भर में पहुँचता है। यानी अगर खार्ग अमेरिका के हाथ लग जाए, तो ईरान की आर्थिक रीढ़ टूट सकती है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान पिछले कुछ हफ्तों से खार्ग द्वीप की रक्षा को मज़बूत करने में लगा है — जाल बिछाए जा रहे हैं, अतिरिक्त सैनिक तैनात किए जा रहे हैं और एयर डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड किया जा रहा है।
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पेंटागन की योजना क्या है?
पिछले एक महीने से अमेरिकी प्रशासन के भीतर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास के उन तटीय इलाकों पर रेड की भी चर्चा है, जहाँ ऐसे हथियार मौजूद हैं जो व्यापारिक और सैन्य जहाज़ों को निशाना बना सकते हैं। एक अधिकारी के मुताबिक यह ऑपरेशन “हफ्तों में, महीनों में नहीं” पूरा होगा — जबकि एक अन्य ने इसे “दो-तीन महीने” का काम बताया।
इस ऑपरेशन में स्पेशल ऑपरेशंस फोर्स के साथ-साथ परंपरागत पैदल सेना भी शामिल हो सकती है। यह पूर्ण पैमाने का ज़मीनी आक्रमण नहीं होगा, लेकिन इसमें अमेरिकी सैनिक ईरानी ड्रोन, मिसाइलों और इम्प्रोवाइज़्ड विस्फोटकों के खतरे में होंगे।

इस योजना के तहत पेंटागन अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीज़न के करीब 3,000 जवानों को मध्य पूर्व भेजने की तैयारी में है, साथ में दो मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट भी रवाना हो सकती हैं।
ट्रंप का रुख और व्हाइट हाउस का जवाब
दिलचस्प बात यह है कि खुद ट्रंप ने 20 मार्च को ओवल ऑफिस में पत्रकारों से कहा था — “मैं कहीं सेना नहीं भेज रहा। अगर भेजता भी, तो तुम्हें नहीं बताता।” वहीं व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी करोलिन लेविट ने कहा — “पेंटागन का काम है कि वो राष्ट्रपति को अधिकतम विकल्प दे। इसका मतलब यह नहीं कि राष्ट्रपति ने कोई फैसला कर लिया है।”
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शुक्रवार को फ्रांस में कहा कि अमेरिका “बिना ज़मीनी सेना के सभी उद्देश्य हासिल कर सकता है।” लेकिन इसके बावजूद एक अधिकारी का कहना था — “यह आखिरी वक्त की कोई योजना नहीं है।”
ईरान की चेतावनी — “अमेरिकी सैनिकों को जला देंगे”
ईरान खामोश नहीं बैठा। ईरान की नौसेना के प्रमुख शाहराम ईरानी ने कहा कि अगर USS अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर उनकी मिसाइल रेंज में आया, तो उसे निशाना बनाया जाएगा। ईरान के संसद अध्यक्ष गालिबाफ ने कहा था कि किसी भी द्वीप पर कब्ज़े की कोशिश पर उस “क्षेत्रीय देश के महत्वपूर्ण ढाँचे” पर हमला होगा जो इस ऑपरेशन में मदद करेगा।
खाड़ी देशों की भी चिंता
खाड़ी के सहयोगी देश भी अमेरिका को ज़मीनी ऑपरेशन के खिलाफ समझा रहे हैं। उनकी चिंता है कि खार्ग पर कब्ज़ा करने से भारी नुकसान होगा और ईरान खाड़ी देशों के बुनियादी ढाँचे को निशाना बना सकता है, जिससे युद्ध और लंबा खिंच जाएगा।
भारत पर असर?
इस पूरी घटना का असर भारत पर भी पड़ सकता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल और एलपीजी मँगाता है। अगर यह रास्ता और लंबे समय तक बंद रहा या जंग और बड़ी हुई, तो पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतें आसमान छू सकती हैं। हर रोज़ मध्यम वर्ग की रसोई से लेकर किसान की ट्रैक्टर की टंकी तक — असर गहरा होगा।
अभी दुनिया की नज़रें ट्रंप पर हैं। एक हस्ताक्षर से खेल बदल सकता है।
