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Donald Trump ने ईरान पर छेड़ी जंग लेकिन अंजाम क्या होगा, यह खुद अमेरिका को नहीं पता!

अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत, तेहरान ने भी किया पलटवार — जानिए पूरा मामला

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ट्रंप का ईरान पर हमला: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में खामेनेई की मौत, अमेरिका को नहीं पता युद्ध का अंजाम | Dainik Diary
अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद तेहरान के आसमान में उठता धुआँ — ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत से दुनिया में हड़कंप।

नई दिल्ली। दुनिया इस वक्त एक नई जंग की आग में झुलस रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू कर दिया है जिसे “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया गया है। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह युद्ध शुरू तो हो गया, पर इसका अंत कहाँ होगा — यह खुद ट्रंप प्रशासन को भी नहीं पता।

खामेनेई की मौत से हिल गई दुनिया

28 फरवरी की सुबह, तेहरान में काम के हफ्ते की शुरुआत के वक्त, अमेरिकी लंबी दूरी की मिसाइलें और ड्रोन इज़राइली लड़ाकू विमानों के साथ मिलकर ईरान की सैकड़ों सैन्य चौकियों पर टूट पड़े — मिसाइल बैटरियां, नौसैनिक जहाज, वायु रक्षा प्रणालियां और कमांड सेंटर। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई, जिन्होंने 36 साल तक ईरान पर शासन किया था। उनके साथ ही कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारी भी मारे गए।

ट्रंप ने खुद इस पर बड़बोलेपन से कहा — “मैंने उनके सभी नेताओं को खत्म कर दिया। वो पूरा कमरा अब नहीं रहा।”

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बदलते रहे ट्रंप के बहाने

इस युद्ध की सबसे अजीब बात यह है कि ट्रंप का हर दिन एक नया लक्ष्य सामने आता है। जब हमले शुरू हुए तो उन्होंने कहा — ईरान के लोगों को आज़ाद कराना है। फिर कहा — परमाणु खतरे को खत्म करना है। फिर बोले — सत्ता परिवर्तन चाहिए। फिर उन्होंने कहा कि वो खुद ईरान का अगला नेता चुनेंगे। और शुक्रवार तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने मांग कर दी — बिना शर्त आत्मसमर्पण।

ट्रंप एक मिनट कहते हैं यह मिशन कुछ दिनों में खत्म होगा, अगले मिनट कहते हैं यह पाँच हफ्ते चलेगा। एक पल में ईरानी लोगों से कहते हैं “अपना भाग्य खुद तय करो”, और अगले ही पल कहते हैं कि उन्हें देश निर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं।

यह भ्रम की स्थिति अमेरिका के अपने सहयोगियों और सांसदों को भी परेशान कर रही है।

ईरान ने भी किया पलटवार

ईरान चुप नहीं बैठा। ईरान ने अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए — जिसमें कतर का अल उदैद एयर बेस भी निशाने पर था। इसके अलावा ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले जहाजों को भी धमकी दी है, जिससे तेल और गैस के दाम बढ़ गए हैं।

समुद्र में भी जंग जारी है। अमेरिका ने श्रीलंका के तट के पास ईरानी नौसैनिक जहाज IRIS Dena को डुबो दिया, और एक अन्य ईरानी जहाज IRIS Bushehr के 200 से ज़्यादा नाविकों को किनारे लाया गया।

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संसद में भी उठे सवाल

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव लाया गया जो ट्रंप को यह युद्ध जारी रखने से रोकता, लेकिन वह 212-219 के संकीर्ण अंतर से विफल हो गया। विपक्षी नेताओं ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि वे बिना किसी योजना, बिना कांग्रेस की मंजूरी और बिना किसी रणनीति के देश को युद्ध में धकेल रहे हैं।

ट्रंप ने वादा किया था कि वो युद्ध खत्म करेंगे, शुरू नहीं। लेकिन सत्ता में वापसी के बाद से उन्होंने आठ देशों पर सैन्य कार्रवाई को हरी झंडी दी है — जिनमें से तीन पर पहले कभी अमेरिका ने सीधा हमला नहीं किया था।

भारत की नज़र भी टिकी

इस पूरे घटनाक्रम पर भारत भी नज़र रखे हुए है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पुष्टि की कि एक ईरानी नौसैनिक जहाज IRIS Lavan को कोच्चि बंदरगाह में आश्रय दिया गया, क्योंकि यह “मानवीय कदम” था। यह दर्शाता है कि भारत इस युद्ध में किसी एक खेमे में शामिल होने से बच रहा है।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध की आर्थिक कीमत भयावह है। ईरान की मिसाइल बौछार का खर्च करोड़ों डॉलर में था, लेकिन उसे रोकने के लिए खाड़ी देशों को उससे कई गुना ज़्यादा खर्च करना पड़ा। ऐसे में यह युद्ध कब और कैसे खत्म होगा — यह सवाल अभी भी हवा में लटका है।

जो बात साफ है वो यह कि मध्य पूर्व की ज़मीन पर धुआँ उठ रहा है, खून बह रहा है और दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति एक ऐसी जंग में उलझ गई है जिसका अंत उसे खुद नहीं पता।

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