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“भारत ने हमारी बात मानी” Donald Trump के मंत्री ने की भारत की तारीफ, रूसी तेल खरीदने की दी ‘परमिशन’

अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने Fox Business पर कहा — भारत “बहुत अच्छा अभिनेता” रहा, इसलिए 30 दिन के लिए रूसी तेल खरीदने की छूट दी गई

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अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भारत को बताया "अच्छा अभिनेता" — ईरान युद्ध के बीच रूसी तेल खरीदने की 30 दिन की अस्थायी छूट दी।

कूटनीति की दुनिया में एक बात बहुत पुरानी है — जो चुप रहकर काम करता है, उसे इनाम मिलता है। और इस बार इनाम मिला है भारत को — वो भी खुद अमेरिका के ट्रेज़री सेक्रेटरी की जुबान से तारीफ के रूप में।

अमेरिकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने Fox Business को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ने भारत को “परमिशन” दी है कि वह उस रूसी तेल को खरीद सकता है जो पहले से समुद्र में जहाजों पर लदा हुआ है — और यह कदम पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बीच वैश्विक तेल आपूर्ति को सुचारु रखने के लिए उठाया गया है।

बेसेंट ने कहा — “भारतीयों ने बहुत अच्छे अभिनेता की भूमिका निभाई। हमने उनसे पिछले साल प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना बंद करने को कहा था। उन्होंने किया। वे अमेरिकी तेल से उसकी जगह भरने वाले थे। लेकिन दुनिया में तेल की अस्थायी कमी को दूर करने के लिए हमने उन्हें रूसी तेल स्वीकार करने की अनुमति दी है।”

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यह छूट क्यों दी गई?

यह 30 दिन का अस्थायी वेवर 5 मार्च से 4 अप्रैल 2026 तक के लिए है। इसके तहत भारतीय रिफाइनरियाँ वह रूसी कच्चा तेल खरीद सकती हैं जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लाद दिया गया था। यानी नया रूसी तेल नहीं — सिर्फ वह तेल जो पहले से समुद्र में तैर रहा है।

अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने ABC News को बताया — “हमने अपने मित्र भारत से कहा है कि वह वह तेल खरीदे जो पहले से जहाजों पर है, उसे अपनी रिफाइनरियों में ले जाए, और उन बैरलों को बाजार में तेजी से उतारे — ताकि बाकी दुनिया पर तेल का दबाव कम हो।”

सरल भाषा में समझें — ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तेल की सप्लाई को बाधित कर दिया है। दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ने का डर है। इसलिए अमेरिका ने एक “शॉर्टकट” अपनाया — समुद्र में अटके रूसी तेल को भारत के जरिए बाज़ार तक पहुँचाओ।

भारत की राजनीति में भूचाल

विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने अमेरिका के सामने “समर्पण” कर दिया और देश के हितों को गिरवी रख दिया। यह सवाल भी उठा कि आखिर भारत ने अमेरिका के कहने पर रूसी तेल खरीदना बंद कब किया — और सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक बयान क्यों नहीं दिया।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो पहले ही फरवरी में कह चुके थे कि भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है — लेकिन भारत सरकार ने इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की।

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भारत के लिए यह सौदा कैसा है?

एक तरफ अमेरिका की तारीफ मिली, दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल भी मिला — फिलहाल तो यह भारत के लिए फायदेमंद लगता है। अमेरिका ने साफ कहा है कि “भारत अमेरिका का अहम भागीदार है और हम उम्मीद करते हैं कि नई दिल्ली आगे चलकर अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगी।”

यानी यह 30 दिन की “परमिशन” एक तरह का पुरस्कार भी है — और आगे अमेरिकी तेल खरीदने का अनकहा वादा भी।

पिछले महीने अमेरिका और भारत ने एक अंतरिम व्यापार समझौते का फ्रेमवर्क तय किया था, जिसके बाद ट्रंप ने भारत पर लगाए 25% के दंडात्मक टैरिफ हटाने का कार्यकारी आदेश जारी किया था। उस समझौते की एक शर्त थी — रूसी तेल की खरीद बंद करना और अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद खरीदना।

भारत की असली चुनौती

यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि भारत की ऊर्जा कूटनीति कितनी नाजुक डोर पर टिकी है। एक तरफ रूस जो सस्ता तेल देता है, दूसरी तरफ अमेरिका जो व्यापार और तकनीक में साझेदार है। एक बार यह 30 दिन की खिड़की बंद हो जाए, तो भारत से अपेक्षा है कि वह अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाए।

अमेरिका की नज़र में भारत “Good Actor” है — लेकिन यह भूमिका निभाने की कीमत क्या होगी, यह आने वाले महीनों में साफ होगा।

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