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ईरान ने दशकों में बनाईं ज़मीन के नीचे “मिसाइल सिटी” अब वही बन गईं उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी
अरबों डॉलर, सैकड़ों किलोमीटर की सुरंगें, 500 मीटर गहरे बंकर — और फिर भी अमेरिका-इज़रायल के सामने महज़ चार दिन में मिसाइल हमले 86% गिर गए। यह कहानी है उस “अभेद्य किले” की जो खुद एक जाल बन गया।
तेहरान / नई दिल्ली। सोचिए — आपने अपने घर के नीचे एक ऐसी तिजोरी बनाई जो बम-प्रूफ हो, दुश्मन की नज़र से ओझल हो, और जिसमें आपका सबसे बड़ा हथियार छुपा हो। आपको लगा — यह तिजोरी आपकी ताक़त है। लेकिन एक दिन आपको पता चला कि उस तिजोरी का दरवाज़ा — जो बाहर खुलता है — दुश्मन की नज़र में है। और जैसे ही आप उसे खोलते हैं, दुश्मन हमला कर देता है।
यही हुआ ईरान के साथ।
दशकों की मेहनत, अरबों की लागत
ईरान का भूमिगत मिसाइल कार्यक्रम 1984 में शुरू हुआ था। IRGC एयरोस्पेस फोर्स के कमांडर अमीर अली हाजीज़ादेह ने एक बार दावा किया था कि ईरान ने देश के हर प्रांत और शहर में 500 मीटर की गहराई तक भूमिगत मिसाइल बेस बनाए हैं।
Kermanshah और Semnan सहित कई प्रांतों में कम से कम पाँच बड़ी “मिसाइल सिटी” की पहचान की गई है — जिनमें भंडारण केंद्र, छुपे हुए लॉन्च सिस्टम और परिवहन सुरंगें शामिल हैं।
2020 में एक वीडियो सामने आया जिसमें विशाल सुरंगों में रेलवे जैसी स्वचालित प्रणाली पर मिसाइलें लोड करके तैयार खड़ी दिखाई दी थीं — जिन्हें बिना किसी क्रेन के सीधे दागा जा सके।
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यह सब देखकर दुनिया ने माना था — ईरान की यह ताक़त “अजेय” है।
वो कमज़ोरी जो किसी ने नहीं देखी
लेकिन इस पूरी रणनीति में एक बड़ा छेद था — बाहर निकलने का रास्ता।
मिसाइलें ज़मीन के सैकड़ों मीटर नीचे सुरक्षित हैं, लेकिन उन्हें दागने के लिए एक संकरे, जाने-पहचाने रास्ते से बाहर आना पड़ता है। और आधुनिक हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन और सैटेलाइट अब इन्हीं सुरंगों के मुहानों पर 24 घंटे नज़र रखते हैं।
अमेरिकी और इज़रायली लड़ाकू विमान और ड्रोन इन विशाल बेस के ऊपर मंडराते रहे और जैसे ही कोई मिसाइल लॉन्चर बाहर निकला, उसे तुरंत नष्ट कर दिया गया।
क्रिकेट की भाषा में कहें तो — ईरान के पास रन बनाने की क्षमता थी, लेकिन क्रीज़ से बाहर निकलते ही रन-आउट हो जाता था।
चार दिन में 86% गिरे मिसाइल हमले
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान के मिसाइल हमले महज़ चार दिनों में 86% तक गिर गए।
CENTCOM कमांडर एडमिरल Brad Cooper ने कहा — “हम ईरान के बचे-खुचे बैलेस्टिक मिसाइल लॉन्चर्स को एक-एक करके ढूंढ रहे हैं। ईरान की हमें और हमारे साझेदारों को निशाना बनाने की क्षमता लगातार कम हो रही है।”
“मिसाइल सिटी” से “मिसाइल कब्रिस्तान”
Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की “मिसाइल सिटी” रणनीति — जो कभी एक बड़ा सामरिक फ़ायदा मानी जाती थी — अब उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन चुकी है। जो हथियार पहले मोबाइल और ढूंढने में मुश्किल थे, वो अब एक तय जगह पर बंधे और आसानी से निशाना बनने योग्य हो गए हैं।
सैटेलाइट तस्वीरों में इन “मिसाइल सिटीज़” के प्रवेश द्वारों के पास जले हुए लॉन्चर्स और क्षतिग्रस्त सुरंगें साफ़ दिखती हैं।

अब ईरान कर रहा है रणनीति में बदलाव
इस स्थिति को भाँपते हुए ईरान अब एक नई दिशा में जा रहा है — स्थायी भूमिगत बेस की जगह, अधिक विकेंद्रीकृत और भ्रामक तैनाती की रणनीति अपनाई जा रही है।
ऐसा लगता है कि ईरान ने युद्ध शुरू होने से पहले ही कुछ लॉन्चर्स को बंकरों से बाहर निकाल कर अलग-अलग जगहों पर तैनात कर दिया था — ताकि वे हमले से बच सकें।
लेकिन सवाल यह है — क्या यह बदलाव बहुत देर से आया?
एक सबक पूरी दुनिया के लिए
ईरान की “मिसाइल सिटी” की यह कहानी सिर्फ एक देश की नहीं है। यह उस सोच का अंत है जो मानती थी कि ज़मीन के नीचे जाने से दुश्मन की नज़र से बचा जा सकता है।
जब सैटेलाइट हर इंच ज़मीन देख सकते हों, जब ड्रोन बिना थके 24 घंटे मँडरा सकते हों, और जब AI एक मिनट में हज़ारों फ़ीड्स विश्लेषण कर सके — तो “छुपना” कोई रणनीति नहीं रहती।
वह जो कभी ताक़त का प्रतीक था, आज इतिहास की सबसे महंगी गलतियों में से एक बनता जा रहा है।
