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जब मैदान में उतरती हैं मजबूत महिलाएं तो समाज क्यों डर जाता है? Smriti Mandhana से जुड़ा एक असहज सच
मांसल शरीर, चौड़े कंधे और ताकतवर जांघें क्या ‘गलती’ हैं? महिला खिलाड़ियों को आज भी क्यों झेलनी पड़ती है बॉडी शेमिंग
जब कोई महिला खेल के मैदान में उतरती है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह तेज़ दौड़े, लंबा अभ्यास करे, ज्यादा ताकत लगाए और हर मुकाबले में अपना सर्वश्रेष्ठ दे। लेकिन जैसे ही उसका शरीर उस मेहनत का प्रतिबिंब बनने लगता है — मांसल बाहें, चौड़े कंधे, मजबूत जांघें — समाज अचानक असहज हो जाता है।
ताकत को “मर्दाना” कहकर खारिज कर दिया जाता है, मानो मजबूत होना किसी महिला की गलती हो। यह सिर्फ मज़ाक या casual टिप्पणी नहीं है, बल्कि Misogyny से उपजी उस मानसिकता का हिस्सा है, जो तय करना चाहती है कि महिलाएं कैसी दिखें, कैसे चलें, कैसे बोलें और कैसे “स्वीकार्य” बनें।
Smriti Mandhana और शरीर से आगे न बढ़ पाने वाली सोच
भारत की सबसे सफल महिला क्रिकेटरों में शुमार Smriti Mandhana आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और पहचान हासिल कर चुकी हैं। उनकी बल्लेबाज़ी, निरंतरता और नेतृत्व की तारीफ पूरी दुनिया करती है।
लेकिन सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में एक बड़ा हिस्सा आज भी उनके खेल से ज़्यादा उनके शरीर पर टिप्पणी करता है। “बहुत मस्कुलर”, “मर्द जैसी”, “फेमिनिन नहीं”—ऐसे शब्द आज भी महिला खिलाड़ियों के लिए आम हैं।

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यह व्यवहार सिर्फ Mandhana तक सीमित नहीं है। महिला क्रिकेट, फुटबॉल, वेटलिफ्टिंग और एथलेटिक्स—हर खेल में महिलाओं को यही झेलना पड़ता है।
‘नाज़ुक या मजबूत’ का झूठा विभाजन
समस्या की जड़ है वह पुरानी धारणा, जिसमें नारीत्व को सिर्फ नाज़ुक, कोमल और पारंपरिक सुंदरता से जोड़ा जाता है।
जब कोई महिला इस ढांचे से बाहर निकलती है, तो समाज असहज हो जाता है।
ताकत को स्वीकार करने के बजाय महिला से ही सवाल किया जाता है —
“इतनी मस्कुलर क्यों हो?”
“थोड़ी और ‘फेमिनिन’ नहीं हो सकती?”
जबकि सच्चाई यह है कि एलीट स्पोर्ट्स शरीर को बदलता ही है। मसल्स, स्टैमिना और हड्डियों की मजबूती कोई सौंदर्य विकल्प नहीं, बल्कि प्रदर्शन की ज़रूरत है।

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मीडिया, ट्रोलिंग और युवा लड़कियों पर असर
जहां पुरुष खिलाड़ियों को ताकतवर दिखने पर सराहा जाता है, वहीं महिला खिलाड़ियों को “अभी भी सुंदर दिखती हैं या नहीं” के तराज़ू पर तौला जाता है।
ऑनलाइन ट्रोलिंग सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहती।
शोध बताते हैं कि बॉडी शेमिंग से
- एंग्ज़ायटी
- ईटिंग डिसऑर्डर
- आत्म-संदेह
जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
कम उम्र की लड़कियों के लिए यह खेल से दूर रहने की वजह भी बन जाती है।
क्या खेल महिलाओं को ‘मर्दाना’ बना देता है?
यह सबसे खतरनाक मिथक है।
इसी डर की वजह से कई परिवार आज भी लड़कियों को खेल से दूर रखते हैं।
असल में खेल महिलाओं को
- आत्मविश्वास
- नियंत्रण
- शारीरिक आज़ादी
देता है।
विडंबना यह है कि समाज महिला सशक्तिकरण की बात करता है, लेकिन जब वह सशक्तिकरण शरीर पर दिखने लगता है, तो उसे अस्वीकार कर देता है।
अब परिभाषा बदलने की ज़रूरत
Smriti Mandhana जैसी खिलाड़ी बिना माफी मांगे अपनी ताकत के साथ मौजूद रहकर ही इस सोच को चुनौती देती हैं।
अब बातचीत सुंदरता से नहीं, उपलब्धियों से शुरू होनी चाहिए।
महिला खिलाड़ियों के शरीर का मज़ाक उड़ाना “हल्का-फुल्का मज़ाक” नहीं, बल्कि नियंत्रण का एक तरीका है।
इसे तोड़ने के लिए
- बेहतर मीडिया प्रतिनिधित्व
- संस्थागत समर्थन
- और सामाजिक सोच में बदलाव
ज़रूरी है।
क्योंकि ताकत “मर्दाना” नहीं होती।
ताकत इंसानी होती है।
और महिला खिलाड़ियों ने इसे पूरी मेहनत से कमाया है।
