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हर फिल्म में वही खलनायक क्यों लगते हैं Sanjay Dutt ,क्या अब इमेज बदलने का वक्त आ गया है
The Raja Saab से फिर लौटे संजय दत्त के विलेन अवतार पर सवाल, क्या इंडस्ट्री उन्हें एक ही फ्रेम में कैद कर चुकी है
एक दौर था जब संजय दत्त का खलनायक बनना दर्शकों के लिए एक सरप्राइज हुआ करता था। उनकी मौजूदगी से पर्दे पर खतरे का एहसास पैदा होता था और किरदार की अलग पहचान बनती थी। लेकिन आज स्थिति कुछ और ही है। अब जब भी संजय दत्त किसी फिल्म में विलेन के रूप में नजर आते हैं, तो दर्शक पहले से अंदाजा लगा लेते हैं कि उनका लुक, बॉडी लैंग्वेज और डायलॉग डिलीवरी कैसी होगी।
The Raja Saab के रिलीज के करीब आते ही एक बार फिर वही सवाल उठ रहा है—क्या संजय दत्त के सभी विलेन किरदार एक जैसे लगने लगे हैं? भारी-भरकम शरीर, सफेद या ग्रे दाढ़ी, सख्त आंखें, गहरी आवाज और सत्ता का रौब… ये सारे एलिमेंट अब एक तयशुदा फॉर्मूला बन चुके हैं।
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मुद्दा यह नहीं है कि संजय दत्त विलेन क्यों बन रहे हैं। भारतीय सिनेमा में यादगार खलनायकों की परंपरा रही है—चाहे वो अमरीश पुरी हों या प्राण। समस्या यह है कि संजय दत्त के किरदार अब अलग-अलग फिल्मों में भी एक ही “कॉम्पोजिट विलेन” जैसे लगने लगे हैं। भाषा बदल जाती है, इंडस्ट्री बदल जाती है, लेकिन उनका स्क्रीन पर्सोना वही रहता है।

खासतौर पर साउथ सिनेमा में, जहां उन्हें बार-बार बाहुबली हीरो के सामने ताकतवर खलनायक के रूप में पेश किया जाता है, वहां यह दोहराव और ज्यादा साफ नजर आता है। प्रभास जैसे सितारों के साथ उनकी टक्कर भले ही भव्य लगे, लेकिन किरदार की परतें अक्सर एक जैसी रह जाती हैं।
यह सवाल सिर्फ संजय दत्त से जुड़ा नहीं है, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री की कास्टिंग सोच पर भी जाता है। क्या निर्माता उन्हें सिर्फ एक ही सांचे में देख पा रहे हैं? क्या उनके अनुभव और अभिनय क्षमता का इस्तेमाल सिर्फ “डर पैदा करने वाले विलेन” तक सीमित कर दिया गया है?
दिलचस्प बात यह है कि संजय दत्त ने अपने करियर में बेहद संवेदनशील, भावुक और ग्रे शेड्स वाले किरदार भी निभाए हैं। अगर उन्हें फिर से ऐसे रोल्स दिए जाएं—जहां विलेन सिर्फ ताकतवर नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से जटिल हो—तो दर्शकों को भी कुछ नया देखने को मिल सकता है।
अब जरूरत है कि फिल्ममेकर रिस्क लें। संजय दत्त को सिर्फ दाढ़ी, भारी आवाज और बंदूक के भरोसे नहीं, बल्कि नए तरह के किरदारों में उतारें। वरना वह दिन दूर नहीं जब दर्शक उनकी एंट्री पर रोमांच के बजाय ऊब महसूस करने लगेंगे।
