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मीडियम गेंदबाज़ों को मारने में मज़ा नहीं आता Virat Kohli की सोच से क्या सीख सकते हैं आज के U19 सितारे

2008 अंडर-19 वर्ल्ड कप विजेता Tanmay Srivastava ने साझा किए Virat Kohli के शुरुआती दिनों के किस्से, Vaibhav Sooryavanshi के लिए बड़ा सबक

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2008 अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने के बाद ट्रॉफी के साथ जश्न मनाती भारतीय टीम

भारत ने एक बार फिर ICC अंडर-19 वर्ल्ड कप जीत लिया है और जश्न के इन पलों में 2008 की उस ऐतिहासिक टीम की यादें भी ताज़ा हो गई हैं, जिसने भारतीय क्रिकेट की दिशा ही बदल दी थी। उसी टीम का हिस्सा रहे Tanmay Srivastava ने हाल ही में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उस बैच को खास क्या बनाता था और क्यों Virat Kohli शुरुआत से ही अलग सोच के खिलाड़ी थे।

तनमय लिखते हैं कि अंडर-19 वर्ल्ड कप सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि सीनियर क्रिकेट तक पहुंचने की सीढ़ी होता है। आज जहां IPL को शॉर्टकट माना जाता है, वहीं पहले घरेलू क्रिकेट ही सबसे बड़ा रास्ता था — लंबा, मुश्किल और धैर्य की कड़ी परीक्षा लेने वाला।

जब पहली बार दिखा Virat Kohli का असली रूप

तनमय कोहली से पहली बार नेशनल क्रिकेट अकादमी के एक ज़ोनल मैच में मिले थे। उस मुकाबले में कई बल्लेबाज़ों ने रन बनाए, लेकिन कोहली कुछ अलग ही नज़र आए। पावर, आक्रामकता और आंखों में जीत की भूख — सब कुछ साफ झलक रहा था।

धीरे-धीरे यह साफ हो गया कि कोहली को दूसरों से अलग बनाता है उनका माइंडसेट। तनमय के मुताबिक, कोहली का एक वाक्य आज भी उन्हें याद है —
“मीडियम गेंदबाज़ों को मारने में कोई मज़ा नहीं है, मुझे तो बेस्ट गेंदबाज़ों को मारना है।”

यही सोच उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। वह सिर्फ रन नहीं बनाना चाहते थे, बल्कि सबसे मजबूत चुनौती को हराना चाहते थे।

2008 की टीम क्यों बनी ‘बेस्ट बैच’

2008 की अंडर-19 टीम की तैयारी लगभग दो साल पहले शुरू हो गई थी। शुरुआत में कप्तानी Piyush Chawla ने संभाली, फिर कुछ सीरीज़ में खुद तनमय कप्तान रहे और आखिरकार Virat Kohli की अगुवाई में भारत ने मलेशिया में वर्ल्ड कप जीत लिया।

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इस टीम की सबसे बड़ी ताकत थी ‘हम’ की भावना। न ‘मैं’, न ‘मेरा’ — सब कुछ टीम के लिए। यही वजह रही कि आगे चलकर इस टीम के 8-9 खिलाड़ी भारतीय सीनियर टीम तक पहुंचे।

मैदान के बाहर की सादगी, जिसने टीम को जोड़ा

तनमय बताते हैं कि उस दौर में न स्मार्टफोन थे, न सोशल मीडिया। विदेशी दौरों पर मिलने वाला डेली अलाउंस भी बहुत सीमित होता था। इसलिए खिलाड़ी ग्रुप में खाना खाते, पैदल लंबी दूरी तय करते और खर्च बचाने की कोशिश करते थे।

इंग्लैंड दौरे पर कोच Lalchand Rajput के दोस्त खिलाड़ियों के लिए खाना लाते थे और पूरी टीम उनका इंतज़ार करती थी। घर फोन करने के लिए $10 का कॉलिंग कार्ड लिया जाता, जिसे खुरचकर नंबर निकालना पड़ता था। वर्ल्ड कप जीतने के बाद सभी खिलाड़ी एक लाइन में खड़े होकर अपने-अपने घर फोन करते थे — वही पल सबसे यादगार बन गए।

Vaibhav Sooryavanshi के लिए सबक

आज के अंडर-19 सितारों, खासकर Vaibhav Sooryavanshi जैसे खिलाड़ियों के लिए यह कहानी एक बड़ा सबक है। असली महानता आसान रन बनाने में नहीं, बल्कि खुद को सबसे मुश्किल चुनौती के सामने खड़ा करने में है।

Virat Kohli की सोच ने यह साबित कर दिया कि टैलेंट के साथ सही माइंडसेट हो, तो अंडर-19 से लेकर इंटरनेशनल क्रिकेट तक का सफर लंबा नहीं लगता।

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