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Donald Trump का NATO पर बड़ा हमला “अमेरिका के बिना NATO एक कागज़ी शेर है, ये सब कायर हैं!”
ईरान युद्ध में साथ न देने पर भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति, Truth Social पर लिखा — “हम याद रखेंगे इनकी कायरता”; यूरोपीय देश भी पलटवार को तैयार
वॉशिंगटन। दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन कहलाने वाले NATO को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा बयान दे दिया है जो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने NATO सदस्य देशों को सीधे-सीधे “कायर” कहा और गठबंधन को “कागज़ी शेर” (Paper Tiger) करार दे दिया। यह बात उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखी, और देखते ही देखते यह दुनियाभर की सुर्खियाँ बन गई।
क्यों भड़के ट्रंप?
बात दरअसल होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की है — वही संकरा समुद्री रास्ता जिससे दुनिया की करीब 20% तेल आपूर्ति गुज़रती है। ईरान के साथ जारी युद्ध के बाद इस रास्ते को खोलने के लिए ट्रंप ने NATO देशों से सैन्य सहयोग माँगा था। लेकिन अधिकांश यूरोपीय देशों ने हाथ खींच लिए। बस यहीं से ट्रंप का गुस्सा फूट पड़ा।
ट्रंप ने Truth Social पर लिखा, “अमेरिका के बिना NATO एक कागज़ी शेर है! इन्होंने परमाणु शक्ति संपन्न ईरान को रोकने की लड़ाई में शामिल होने से मना कर दिया। अब जब यह लड़ाई सैन्य रूप से जीत ली गई है और इनके लिए खतरा न के बराबर है, तो ये महँगे तेल की शिकायत कर रहे हैं — लेकिन होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने में मदद नहीं करना चाहते। कायर! और हम याद रखेंगे।”
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यूरोप ने क्यों नहीं दिया साथ?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने साफ कह दिया कि फ्रांस होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने की किसी भी सैन्य कार्रवाई में शामिल नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह युद्ध अमेरिका और इजराइल ने यूरोपीय सहयोगियों से बिना सलाह लिए शुरू किया था। सरल भाषा में कहें तो यूरोप का कहना है — “तुमने बिना पूछे आग लगाई, अब हम बुझाने क्यों आएँ?”
इसे ऐसे समझिए — मान लीजिए आपके मोहल्ले में कोई पड़ोसी बिना किसी की राय लिए किसी से झगड़ा मोल ले ले, और फिर सबसे कहे कि “मेरी मदद करो।” तो स्वाभाविक रूप से बाकी लोग पीछे हट जाएंगे। यूरोप की यही स्थिति है।
Germany और Canada ने भी खींचे हाथ
जर्मनी और इटली ने स्पष्ट कहा कि जब तक सक्रिय युद्धविराम नहीं होता, वे कोई कार्रवाई नहीं करेंगे। कनाडा ने भी कह दिया कि वह इस युद्ध में भागीदार नहीं बनेगा। हालाँकि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और नीदरलैंड्स ने एक संयुक्त बयान में होर्मुज़ में “सुरक्षित आवागमन” सुनिश्चित करने के प्रयासों में योगदान की “तैयारी” जरूर जताई — लेकिन यह सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बिल्कुल अलग है।
यूरोप का पलटवार — “यह कायरता नहीं, समझदारी है”
अमेरिकी पत्रकार ऐन अपलबाम ने यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि यह कायरता नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। उनका कहना था, “यूरोप के सहयोगियों की तरफ से जो सुन रहे हैं वह कायरता नहीं है — यह एक गणना है। पिछले एक साल में उन्होंने ट्रंप को खुद उनका अपमान करते देखा है।”

NATO महासचिव ने बचाई इज्जत
NATO महासचिव मार्क रुटे ने गुरुवार को कहा था कि उन्हें “पूरा भरोसा है” कि गठबंधन और उसके सहयोगी होर्मुज़ में यातायात बहाल करने का रास्ता निकाल लेंगे। लेकिन ट्रंप के इस ताज़े हमले के बाद उनकी यह “उम्मीद” और भी खोखली लगने लगी।
असली मुद्दा क्या है?
यह युद्ध 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के साथ शुरू हुआ था। इसने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है, भारी जान-माल का नुकसान हुआ है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। ऐसे में यूरोप नहीं चाहता कि वह इस आग में कूदे और अपने नागरिकों को खतरे में डाले।
जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह गुस्सा असल में NATO की उस पुरानी दरार को और चौड़ा कर रहा है जो कई वर्षों से बनती आ रही है। एक तरफ अमेरिका है जो चाहता है कि बाकी देश उसकी हर लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाएँ, और दूसरी तरफ यूरोप है जो खुद को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
इस पूरे विवाद में एक बात साफ है — दुनिया का सबसे पुराना और ताकतवर सैन्य गठबंधन आज अपने ही सबसे बड़े सदस्य की नज़रों में “कागज़ी शेर” बन गया है। अब देखना यह है कि यह दरार भरती है या और गहरी होती है।
