India News
“RBI ने घटाई रेपो दर! 25 bps कट के बाद क्या सच में ‘Goldilocks Zone’ में पहुँच गई भारतीय अर्थव्यवस्था…?”
मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने छह महीने बाद रेपो रेट में कटौती की, GDP ग्रोथ बढ़ाई और FY26 के लिए महंगाई अनुमान घटाया।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को एक अहम फैसला लेते हुए रेपो दर में 25 बेसिस प्वाइंट (bps) की कटौती कर इसे 5.25% कर दिया। छह महीने बाद की यह पहली कटौती ऐसे समय में हुई है जब भारत की अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच “Goldilocks Zone”—यानी उच्च विकास और निम्न महंगाई—में बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।
RBI का बड़ा कदम: रेपो दर 5.25% पर
3–5 दिसंबर तक चली मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee-MPC) की बैठक के बाद RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि कम महंगाई और मजबूत ग्रोथ ने भारत को दुर्लभ “गोल्डीलॉक्स अवधि” प्रदान की है।
उन्होंने कहा—
“चुनौतीपूर्ण बाहरी वातावरण के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया है। महंगाई अनुमान ने हमें विकास-समर्थक रुख बनाए रखने की गुंजाइश दी है।”

मल्होत्रा के इस बयान से साफ है कि RBI फिलहाल आक्रामक रुख से बचते हुए ग्रोथ को प्राथमिकता देने की रणनीति अपना रहा है।
मौद्रिक नीति के मुख्य फैसले (3–5 दिसंबर बैठक):
- रेपो रेट 25 bps घटाकर 5.25%
- मौद्रिक रुख ‘Neutral’ रखा गया
- GDP ग्रोथ अनुमान 6.8% से बढ़ाकर 7.3% किया
- FY26 के लिए महंगाई अनुमान 2.6% से घटाकर 2% किया
- ₹1 लाख करोड़ के OMO (ओपन मार्केट ऑपरेशन) खरीद की घोषणा
- $5 बिलियन डॉलर–रुपया स्वैप दिसंबर में किया जाएगा
मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि भारत की महंगाई RBI के 4% लक्ष्य से काफी नीचे है, जिसने दर कटौती को आसान बनाया।
रुपये और बॉन्ड मार्केट की प्रतिक्रिया
रेपो रेट कटौती के तुरंत बाद भारतीय रुपया मजबूत हुआ और 0.2% चढ़कर 89.7750 प्रति डॉलर पहुंच गया।
वहीं 10-year sovereign bonds में तेजी आई और यील्ड 6 basis points गिरकर 6.46% पर आ गई।
विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम बाजार के लिए राहत का संकेत है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% शुल्क (tariffs) के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही है।
क्या RBI और कटौती करेगा?
पिछले दो नीति बैठकों में RBI ने दरों में कोई बदलाव नहीं किया था। लेकिन पिछले महीने गवर्नर मल्होत्रा ने कहा था कि “दरें घटने की गुंजाइश है।”
परंतु उसके बाद रुपये में गिरावट और वैश्विक अस्थिरता देखी गई, जिससे दर कटौती की उम्मीदें कमजोर हो गई थीं।

ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड बैंकिंग ग्रुप के अर्थशास्त्री धीरज निम का कहना है कि यह शायद अंतिम दर कटौती हो सकती है।
उनके अनुसार:
“अब RBI की प्राथमिकता दरों के बजाय लिक्विडिटी सपोर्ट पर होगी।”
इसके अलावा वे मानते हैं कि अमेरिकी Federal Reserve भी दिसंबर में easing कर सकता है, जिससे दोनों बाज़ारों का ब्याज अंतर सुरक्षित रहेगा और रुपये पर ज़्यादा दबाव नहीं आएगा।
क्या भारत सच में Goldilocks Zone में है?
ग्रोथ तेज़, महंगाई कम, निवेश का माहौल मजबूत—यह वह स्थिति है जिसे कई अर्थव्यवस्थाएँ तरसती हैं। भारत इस समय उसी अवस्था के करीब दिख रहा है।
GDP का अनुमान बढ़ाया जाना और महंगाई का अनुमान घटाया जाना यह संकेत देता है कि भारत की आर्थिक बुनियाद फिलहाल मजबूत है।
हालांकि, रुपया हाल ही में 90 प्रति डॉलर के नीचे फिसल चुका है, जो बताता है कि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
