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भारत की दीवार राहुल द्रविड़ का दर्द करियर के वो दो मैच जिनका नतीजा बदलना चाहते हैं
राहुल द्रविड़ ने अश्विन से बातचीत में बताया 1997 बारबाडोस टेस्ट और 2003 वर्ल्ड कप फाइनल आज भी उन्हें करते हैं हताश।
भारतीय क्रिकेट इतिहास में राहुल द्रविड़ को उनकी ठोस तकनीक और जज़्बे की वजह से “दीवार” कहा जाता है। 17 साल तक भारतीय टीम के लिए खेलने वाले द्रविड़ ने अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे। उन्होंने टेस्ट और वनडे मिलाकर 24,000 से ज्यादा रन बनाए और भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाई दी। लेकिन इतने सफल करियर के बावजूद द्रविड़ के मन में आज भी कुछ अधूरापन बाकी है।
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हाल ही में भारतीय स्पिनर रविचंद्रन अश्विन से बातचीत में राहुल द्रविड़ ने उन दो मैचों का जिक्र किया जिनका नतीजा वह अपने करियर से बदलना चाहते हैं।
1997 बारबाडोस टेस्ट का दर्द
द्रविड़ ने कहा कि 1997 के वेस्टइंडीज दौरे पर खेले गए बारबाडोस टेस्ट को वे कभी नहीं भूल सकते। उस मैच में भारत को जीत के लिए सिर्फ 120 रन चाहिए थे, लेकिन पूरी टीम महज 80 रनों पर सिमट गई। द्रविड़ ने कहा, आखिरी विकेट जोड़ियों ने 50-60 रन जोड़े थे। पिच मुश्किल थी, लेकिन हमें जीतना चाहिए था। अगर वह मैच जीत जाते तो पूरी सीरीज हमारे नाम होती।

2003 वर्ल्ड कप फाइनल की कसक
द्रविड़ ने दूसरा मैच 2003 का वर्ल्ड कप फाइनल चुना। दक्षिण अफ्रीका में खेले गए इस मुकाबले में भारत का सामना ऑस्ट्रेलिया से हुआ था। भारत ने टॉस जीतकर गेंदबाजी का फैसला किया, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने बेहतरीन बल्लेबाजी करते हुए बड़ा स्कोर खड़ा कर दिया। भारत यह मैच 125 रनों से हार गया। द्रविड़ बोले, “काश हम वह फाइनल जीत पाते। वह हमारे लिए विश्व कप जीतने का सबसे नजदीकी मौका था।”
भारतीय क्रिकेट के अनमोल सितारे
राहुल द्रविड़ का करियर भले ही इन दो हारों की कसक से भरा रहा हो, लेकिन उन्होंने भारतीय क्रिकेट को जो योगदान दिया, वह बेमिसाल है। टेस्ट क्रिकेट में उनकी पारियां आज भी युवा खिलाड़ियों के लिए मिसाल हैं। द्रविड़ का मानना है कि हार से सीख लेकर ही खिलाड़ी मजबूत बनता है और यही उनकी सफलता का सबसे बड़ा राज़ रहा।

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