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तलवार उठाओ, पर ढाल मत भूलो: Ishan Kishan क्या Rishabh Pant की किस्मत से सीख ले सकते हैं?

आक्रामकता बनाम समझदारी—ऋषभ पंत की उतार-चढ़ाव भरी कहानी से ईशान किशन के लिए छिपा है बड़ा सबक

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ऋषभ पंत और ईशान किशन—भारतीय क्रिकेट में आक्रामक विकेटकीपर-बल्लेबाज़ की नई बहस का केंद्र।

भारतीय क्रिकेट में विकेटकीपर-बल्लेबाज़ की भूमिका हमेशा से खास रही है, लेकिन हाल के वर्षों में यह जिम्मेदारी जोखिम और रोमांच का पर्याय बन गई है। इसका सबसे बड़ा चेहरा हैं Rishabh Pant—एक ऐसे बल्लेबाज़ जो हर गेंद को चुनौती समझते हैं। पंत का खेल अक्सर दो ध्रुवों के बीच झूलता दिखता है—कभी “कमाल, कमाल, कमाल” और कभी “ये क्या कर दिया?”

2025 के अंत में दक्षिण अफ्रीका दौरे पर टेस्ट सीरीज़ के दौरान पंत के कुछ शॉट्स ने एक बार फिर चयनकर्ताओं और कोचिंग स्टाफ को असहज कर दिया। आक्रामकता की आदत, जो कभी भारत को मुश्किल हालात से बाहर निकालती थी, उसी ने इस बार सवाल खड़े कर दिए। नतीजा यह हुआ कि घरेलू धरती पर होने वाले T20 वर्ल्ड कप से उनका नाम बाहर रहा और ODI टीम में भी उनकी जगह को लेकर संदेह गहराने लगा।

इसी दौरान घरेलू क्रिकेट में Ishan Kishan का बल्ला जमकर बोला। लगातार रन, आत्मविश्वास और फॉर्म—सब कुछ ईशान के पक्ष में जाता दिखा। यही वह मोड़ है, जहां तुलना स्वाभाविक हो जाती है।

पंत की कहानी, ईशान के लिए चेतावनी

ऋषभ पंत की बल्लेबाज़ी को अक्सर उन शुरुआती पायलट्स से जोड़ा जाता है, जो ध्वनि की गति तोड़ने के जुनून में कभी धीमा होना नहीं चाहते थे। इतिहास गवाह है कि कई ऐसे पायलट्स ने रुकने या बचने के बजाय टकराना चुना। पंत भी कुछ ऐसे ही दिखते हैं—हर हाल में हमला, चाहे हालात साथ हों या नहीं।

यही वह बिंदु है, जहां ईशान किशन के लिए सबक छिपा है। तलवार उठाना ज़रूरी है, लेकिन ढाल साथ रखना भी उतना ही अहम। आधुनिक क्रिकेट सिर्फ आक्रामकता नहीं, बल्कि स्थिति के अनुसार निर्णय की मांग करता है।

ISHAN AND PANT


आक्रामकता ही काफी नहीं

पंत का करियर इस बात का उदाहरण है कि बेमिसाल टैलेंट के बावजूद, अगर नियंत्रण न हो तो क्रिकेट कितना बेरहम हो सकता है। चयनकर्ता अब सिर्फ शॉट्स नहीं, बल्कि मैच अवेयरनेस भी देख रहे हैं। ईशान के पास वही आक्रामकता है, लेकिन अगर उसमें धैर्य और जिम्मेदारी जुड़ जाए, तो वह लंबी रेस के घोड़े साबित हो सकते हैं।

भविष्य की जंग

भारत के लिए विकेटकीपर-बल्लेबाज़ की रेस अब सिर्फ पंत बनाम ईशान की नहीं रही। यह उस सोच की लड़ाई है, जहां टीम को ऐसा खिलाड़ी चाहिए जो ज़रूरत पड़ने पर खेल को तेज़ करे, और हालात बिगड़ने पर उसे थाम भी सके।

अगर ईशान किशन पंत की राह से सिर्फ आक्रामकता नहीं, बल्कि उसकी कीमत भी समझ लें, तो आने वाले वर्षों में टीम इंडिया को एक ज्यादा संतुलित मैच-विनर मिल सकता है।

क्योंकि क्रिकेट में, सिर्फ तलवार से जंग नहीं जीती जाती—कभी-कभी ढाल ही जीत की वजह बनती है।

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