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Lionel Messi का नाम काफी नहीं भारतीय फुटबॉल को अब खुद करनी होगी लड़ाई, 14 फरवरी से शुरू होगा ISL

फीफा रैंकिंग में लगातार गिरावट, इंटरनेशनल लेवल पर कमजोर पहचान और घरेलू लीग से उम्मीदें—क्या ISL बदल पाएगा भारतीय फुटबॉल की तस्वीर?

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भारतीय फुटबॉल की चुनौती और ISL से उम्मीदें | Dainik Diary
फीफा रैंकिंग में गिरावट के बीच ISL से भारतीय फुटबॉल को नई दिशा मिलने की उम्मीद

भारतीय फुटबॉल एक बार फिर अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। बड़े नामों, सोशल मीडिया चर्चाओं और विदेशी सितारों की मौजूदगी के बावजूद ज़मीनी सच्चाई यही है कि भारत अभी भी अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मानचित्र पर खुद को मज़बूती से स्थापित नहीं कर पाया है।

हाल ही में जारी फीफा रैंकिंग ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। भारतीय पुरुष फुटबॉल टीम अब 142वें स्थान पर खिसक चुकी है, जबकि महिला टीम की रैंकिंग 67वें स्थान पर पहुंच गई है। यह दोनों ही आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि सिस्टम में कुछ बुनियादी बदलाव की ज़रूरत है, सिर्फ बड़े नाम जोड़ने से बात नहीं बनेगी।

पिछले कुछ समय में भारतीय फुटबॉल को लेकर उम्मीदें तब जगी थीं जब दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ियों में गिने जाने वाले लियोनेल मेस्सी का नाम भारत से जोड़ा गया। भले ही वह जुड़ाव प्रचार और चर्चाओं तक सीमित रहा हो, लेकिन इससे यह सवाल ज़रूर खड़ा हुआ कि क्या सिर्फ किसी सुपरस्टार की मौजूदगी भारतीय फुटबॉल को नई ऊंचाई दे सकती है?

जवाब शायद नहीं है। क्योंकि फुटबॉल किसी एक चेहरे से नहीं, बल्कि मजबूत अकादमियों, जमीनी टैलेंट, बेहतर कोचिंग और लॉन्ग-टर्म प्लानिंग से आगे बढ़ता है।

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इसी बीच भारतीय फुटबॉल के लिए एक नई उम्मीद 14 फरवरी से शुरू होने जा रही है, जब इंडियन सुपर लीग (ISL) का नया सीजन मैदान में उतरेगा। ISL को पिछले कुछ सालों में देश की सबसे बड़ी फुटबॉल लीग के रूप में देखा गया है, जिसने युवाओं को मंच दिया, स्टेडियम्स में भीड़ लौटाई और फुटबॉल को फिर से चर्चा में लाया।

भारतीय फुटबॉल की चुनौती और ISL से उम्मीदें | Dainik Diary


हालांकि, सवाल अब यह है कि क्या ISL सिर्फ एक एंटरटेनमेंट प्रोडक्ट बनकर रह जाएगी या फिर यह भारतीय फुटबॉल की असली रीढ़ साबित होगी? कई पूर्व खिलाड़ी और विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक घरेलू लीग का सीधा फायदा भारतीय फुटबॉल टीम को नहीं मिलता, तब तक रैंकिंग और प्रदर्शन में बड़ा सुधार मुश्किल है।

महिला फुटबॉल की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। हाल के वर्षों में महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुछ सकारात्मक संकेत ज़रूर दिए हैं, लेकिन रैंकिंग में गिरावट यह बताती है कि निरंतरता की कमी अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

फुटबॉल प्रेमियों की नज़रें अब ISL पर टिकी हैं—क्या यह लीग सिर्फ विदेशी खिलाड़ियों और हाई-वोल्टेज मैचों तक सीमित रहेगी या फिर स्थानीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए तैयार करने का काम भी करेगी?

भारतीय फुटबॉल को अब किसी मेस्सी के नाम की नहीं, बल्कि खुद की पहचान बनाने की ज़रूरत है। और शायद 14 फरवरी से शुरू होने वाला ISL सीजन इस बदलाव की पहली सीढ़ी साबित हो सकता है।