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पोडियम से प्लेग्राउंड तक असर: बड़े मेडल्स ने कैसे भारत में जैवलिन, शूटिंग और बैडमिंटन की तस्वीर बदल दी

नीरज चोपड़ा से लेकर सत्विक-चिराग तक, स्टार एथलीट्स की जीत ने जमीनी स्तर पर पैदा की नई खेल क्रांति

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नीरज चोपड़ा और अन्य भारतीय चैंपियंस की सफलता से प्रेरित युवा एथलीट्स, जिनसे देशभर में खेलों की नई लहर उठी है।

भारतीय खेलों में अब बदलाव सिर्फ पोडियम तक सीमित नहीं है। ओलंपिक और वर्ल्ड चैंपियनशिप के बड़े मेडल्स का असर अब प्लेग्राउंड, स्टेडियम और छोटे कस्बों तक साफ दिखाई देने लगा है। जैवलिन, शूटिंग और बैडमिंटन जैसे खेलों में हाल के वर्षों में जिस तरह से भागीदारी बढ़ी है, वह बताती है कि जब कोई चैंपियन उभरता है, तो उसके पीछे एक पूरी पीढ़ी खड़ी हो जाती है।

इस बदलाव की सबसे मजबूत मिसाल हैं Neeraj Chopra। टोक्यो ओलंपिक 2021 में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के बाद जैवलिन थ्रो भारत के सबसे तेजी से बढ़ते खेलों में शामिल हो गया। नीरज की उपलब्धि को याद करने के लिए शुरू किए गए नेशनल जैवलिन डे में भागीदारी सिर्फ तीन साल में सात गुना बढ़ गई—2022 में 700 से बढ़कर 2025 में करीब 5,000 तक।

इस उछाल के पीछे सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि नई सोच भी है। पश्चिम बंगाल के मालदा जैसे छोटे शहरों से निकलकर बच्चे सुबह-सुबह अभ्यास के लिए साइकिल पर जैवलिन लेकर निकल रहे हैं। कोच और परिवार सीमित साधनों के बावजूद सपनों से समझौता नहीं कर रहे।

महिलाओं की मजबूत एंट्री

इस खेल क्रांति की सबसे बड़ी ताकत हैं महिला एथलीट्स। जूनियर नेशनल जैवलिन चैंपियनशिप में महिलाओं की भागीदारी में 125% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जहां 2019 में यह संख्या बेहद सीमित थी, वहीं 2024 तक यह तीन अंकों में पहुंच चुकी है। सीनियर लेवल पर भी महिलाओं की संख्या में 70% तक का इजाफा देखा गया है, जबकि पुरुषों की भागीदारी लगभग स्थिर रही।

शूटिंग में भी दिखा मेडल इफेक्ट

जैवलिन के बाद सबसे बड़ा उछाल शूटिंग में देखने को मिला है। यह वही खेल है जिसने आज़ादी के बाद भारत को पहला व्यक्तिगत ओलंपिक गोल्ड दिलाया था—Abhinav Bindra के जरिए।
2019 में जहां नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में करीब 8,000 प्रतिभागी थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 17,000 हो गई। खासकर एयर राइफल और एयर पिस्टल इवेंट्स में, जहां भारत ने लगातार अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते हैं, वहां भागीदारी दोगुनी से ज्यादा हो चुकी है।

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बैडमिंटन में डबल्स की नई लहर

बैडमिंटन में भी सफलता का असर साफ दिखता है। Satwiksairaj Rankireddy और Chirag Shetty की ऐतिहासिक जीतों ने डबल्स इवेंट को नई पहचान दी है। जूनियर टूर्नामेंट्स में अंडर-19 पुरुष डबल्स की एंट्रीज़ में 100% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी बच्चों की भीड़ पहले से कहीं ज्यादा नजर आने लगी है।

कुछ चेतावनी संकेत भी

हालांकि हर खेल में तस्वीर इतनी चमकदार नहीं है। तीरंदाजी और कुश्ती जैसे खेलों में भागीदारी के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं। खासकर कुश्ती में, हालिया विवादों के बाद नेशनल चैंपियनशिप में एंट्रीज़ में भारी गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि आंतरिक स्थिरता और भरोसा लौटे बिना इन खेलों में पुरानी रफ्तार वापस आना मुश्किल है।

खेलों का असली असर

फिर भी कुल तस्वीर उम्मीद से भरी है। भारत में खेल अब सिर्फ मेडल जीतने का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम बनते जा रहे हैं। छोटे शहरों, सीमित संसाधनों और पारंपरिक सोच से निकलकर बच्चे—खासकर लड़कियां—खुद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए तैयार कर रही हैं।

जैसा कि खेल प्रशासक और कोच मानते हैं, जब एक चैंपियन उठता है, तो वह अकेला नहीं दौड़ता—उसके पीछे पूरा देश दौड़ने लगता है।

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