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जब बच्चों की तूलिका ने कराई भारत-पाक क्रिकेटरों की ‘हैंडशेक’, शांति का संदेश फिर बना मिसाल
तनावपूर्ण रिश्तों के बीच ‘आघाज़-ए-दोस्ती’ का 14वां पीस कैलेंडर जारी, बच्चों की पेंटिंग्स में दिखा साथ बढ़ने का सपना
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भले ही सियासी ठंडक बनी हुई हो, लेकिन सरहद के दोनों ओर बच्चे आज भी शांति और दोस्ती का सपना देख रहे हैं। इसी उम्मीद को रंगों में उतारते हुए Aaghaz-e-Dosti ने वर्ष 2026 के लिए अपना 14वां पीस कैलेंडर जारी किया है। इस खास कैलेंडर में भारत और पाकिस्तान के बच्चों की बनाई 12 पेंटिंग्स शामिल हैं—छह भारत से और छह पाकिस्तान से।
पंजाब के Anandpur Sahib में आयोजित कार्यक्रम में जारी इस पीस कैलेंडर की थीम थी “Together We Rise” यानी साथ मिलकर आगे बढ़ना। बच्चों की कलाकृतियों में क्रिकेट से लेकर तकनीक और साझा विकास तक, हर उस सपने की झलक दिखी जो दोनों देशों के बीच शांति की उम्मीद जगाता है।
इस साल सबसे ज्यादा चर्चा में रही पाकिस्तान के फैसलाबाद की छात्रा Laila Babar की पेंटिंग, जिसमें उन्होंने भारतीय और पाकिस्तानी क्रिकेटरों को मैदान पर हाथ मिलाते हुए दिखाया है। यह तस्वीर उस खेल भावना की याद दिलाती है, जिसकी कमी अक्सर बड़े मंचों पर महसूस की जाती है।
‘आघाज़-ए-दोस्ती’ की सह-संस्थापक और दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ी समाजशास्त्र प्रोफेसर Devika Mittal का कहना है कि कूटनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन बच्चों के मन में शांति का सपना मरना नहीं चाहिए। “भविष्य बच्चों का है और भविष्य बिना शांति के संभव नहीं,” उनका मानना है।

इस पहल की खास बात यह है कि साल 2012 से लेकर अब तक, चाहे दोनों देशों के रिश्ते जैसे भी रहे हों, यह पीस कैलेंडर एक भी साल रुका नहीं। कोविड महामारी के दौरान भी इसे जारी रखा गया, भले ही उस समय कोई भौतिक कार्यक्रम संभव न हो पाया हो।
संस्था के सह-संस्थापक Ravi Nitesh बताते हैं कि बच्चों की पेंटिंग्स यह भी दिखाती हैं कि वे आसपास की घटनाओं को कितनी गहराई से समझते हैं। कभी करतारपुर कॉरिडोर, कभी ओलंपिक भाला फेंक में भारत-पाक दोस्ती, तो कभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में सहयोग—हर विषय बच्चों की सोच में झलकता है।
इस साल भारत की ओर से दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश से पेंटिंग्स आईं, जबकि पाकिस्तान की तरफ से कराची, लाहौर और फैसलाबाद के बच्चों ने हिस्सा लिया। पहले बच्चे एक-दूसरे को हाथ से लिखे खत भी भेजते थे, लेकिन 2019 के बाद डाक सेवा बंद होने से अब वे पत्र स्कैन कर साझा किए जाते हैं।
इन तस्वीरों और शब्दों के जरिए बच्चों ने एक बार फिर यह साबित किया है कि नफरत की दीवारें बड़ी जरूर हैं, लेकिन उम्मीद की खिड़कियां अब भी खुली हुई हैं।
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