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Dharmendra की वसीयत का खुलासा: दो घर, एक दिल – 400 करोड़ की विरासत के पीछे छुपी भावुक कहानी

जूहू के बंगले से लोनावला फार्म हाउस तक, धर्मेंद्र ने आख़िरी चिट्ठी में कैसे जोड़ दिया प्रकाश कौर और हेमा मालिनी का घर – पढ़िए देओल परिवार के दर्द, सम्मान और रिश्तों की अनसुनी दास्तान

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धर्मेंद्र की सील बंद वसीयत ने दिखाया – दो परिवार, एक विरासत। जूहू के बंगले से लोनावला फार्म हाउस तक, हर फैसले में था सिर्फ प्यार और सम्मान।
धर्मेंद्र की सील बंद वसीयत ने दिखाया – दो परिवार, एक विरासत। जूहू के बंगले से लोनावला फार्म हाउस तक, हर फैसले में था सिर्फ प्यार और सम्मान।

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र को गुज़रे कुछ ही समय हुआ है, लेकिन उनकी यादें आज भी चाहने वालों के दिल में बिल्कुल ताज़ा हैं। सोशल मीडिया पर लोग रोज़ उनके पुराने इंटरव्यू, डायलॉग और गाने शेयर करते हैं। खुद परिवार के लोग भी कई बार भावुक पोस्ट कर देते हैं – “उन्हें हर दिन याद करता हूं, आप सबकी दुआएं महसूस करता हूं…” जैसी पंक्तियाँ आज भी फैंस को रुला देती हैं।

लेकिन पर्दे के पीछे उनके घर के अंदर जो कुछ चल रहा था, वह किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं था। शोक, खामोशी, अपराधबोध, सम्मान और विरासत… सब एक साथ।

सील बंद लिफाफा: जिसने कमरे की हवा बदल दी

अंतिम संस्कार के बाद जब परिवार उनके कमरे में गया, तो वह कमरा जैसे बोल रहा था – दीवारों पर लगी तस्वीरें, शेल्फ़ पर रखी ट्राफियाँ, खिड़की के पास पड़ी कुर्सी, जहां वह अक्सर बैठकर स्क्रिप्ट पढ़ा करते थे।

इसी बीच अलमारी के ऊपरी हिस्से से एक सील बंद लिफ़ाफा मिला। उस पर साफ लिखा था:

“मेरी वसीयत, मेरे जाने के बाद।”

बस यही पांच–छह शब्द कमरे की हवा बदलने के लिए काफी थे। हर चेहरा एक-दूसरे को देखने लगा। किसी ने लिफाफा खोला, तो मानो समय रुक गया। यह सिर्फ कोई कागज़ नहीं था, यह उस इंसान की आखिरी सोच थी जिसने ज़िंदगी भर दो परिवारों के बीच संतुलन बनाए रखा।

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पहला नाम: प्रकाश कौर और बच्चों का दर्द थोड़ा हल्का हुआ

वसीयत का पहला पन्ना जैसे ही ज़ोर से पढ़ा गया, सबसे पहले नाम आया – प्रकाश कौर
फिर लिखा था कि उनकी कुल संपत्ति का आधा हिस्सा प्रकाश कौर और उनके चारों बच्चों – सनी देओल, बॉबी देओल, अजिता और विजेता – को दिया जाए।

सालों से मन में जो सवाल छिपा था –
“दूसरी शादी के बाद भी क्या हम उतने ही अपने हैं?”
उसका जवाब उन्हें इस वसीयत में मिल गया।

प्रकाश कौर ने कभी टीवी पर आकर शिकायत नहीं की, न ही किसी इंटरव्यू में अपना दर्द बेचा। उन्होंने बस चुपचाप अपने बच्चों को संभाला और इज़्ज़त से जीवन जिया। लेकिन इस दिन उन्हें महसूस हुआ कि धर्मेंद्र ने उनके धैर्य और त्याग को दिल से पहचाना है।

सनी के चेहरे पर भी हल्का बदलाव दिखा। यह वही बेटा था जिसने अपनी मां के आंसू देखे, समाज की बातें सुनीं और पिता की दूसरी शादी का बोझ दिल में लेकर बड़ा हुआ। वसीयत में जब उन्होंने पढ़ा –
“दोनों घर एक हैं, मेरे जाने के बाद कोई झगड़ा नहीं होना चाहिए।”
तो उनके भीतर का गुस्सा नरम पड़ गया।

दूसरा पन्ना: हेमा मालिनी के लिए सम्मान, जो उन्होंने कभी मांगा नहीं

अगली लाइन ने पूरे कमरे को खामोश कर दिया।
धर्मेंद्र ने लिखा था कि बची हुई आधी संपत्ति उनकी दूसरी पत्नी हेमा मालिनी और बेटियों ईशा देओल और आहाना देओल के नाम होगी।

जिस पल यह बात पढ़ी गई, सबकी निगाहें हेमा पर टिक गईं।
वह रो नहीं रहीं थीं, लेकिन उनकी आंखें बोल रही थीं कि यह सिर्फ जायदाद नहीं, बल्कि सम्मान का सवाल था।

हेमा ने हमेशा इंटरव्यू में यही कहा कि उन्हें धन नहीं, सिर्फ धर्मेंद्र का साथ और इज़्ज़त चाहिए। वह लंबे समय तक सब से अलग रहकर भी किसी पर उंगली नहीं उठातीं, कभी मीडिया के सामने किसी के खिलाफ शब्द नहीं बोलतीं।

ऐसे में इस वसीयत ने उन्हें वो सम्मान दिया, जो उन्होंने कभी मांगा भी नहीं था, लेकिन जिसके वह पूरी तरह हक़दार थीं।

ईशा और आहाना ने जब कागज़ में यह सब पढ़ा, तो शायद उन्हें पहली बार लगा कि उनके पिता ने भी उनके लिए उतना ही सोचा, जितना दुनिया उनके बारे में कम बोलती थी।

जूहू का बंगला: ईंटों में बंद यादें, ज़मीन पर नहीं बल्कि दिलों पर लिखा फैसला

धर्मेंद्र की कुल संपत्ति का अनुमान 335 से 450 करोड़ के बीच बताया जाता है। लेकिन इन सबमें सबसे ज्यादा चर्चा होती है उनके जूहू वाले बंगले की, जो किसी महज़ प्रॉपर्टी से कहीं ज्यादा, एक जिंदा याद जैसा है।

धर्मेंद्र की सील बंद वसीयत ने दिखाया – दो परिवार, एक विरासत। जूहू के बंगले से लोनावला फार्म हाउस तक, हर फैसले में था सिर्फ प्यार और सम्मान।


यहीं:

  • सनी और बॉबी की पहली हिट फिल्मों का जश्न मनाया गया,
  • रातों को स्क्रिप्ट पर बहसें हुईं,
  • इंडस्ट्री के बड़े-बड़े सितारे आते-जाते रहे,
  • और परिवार ने अनगिनत त्योहार साथ मनाए।

वसीयत में धर्मेंद्र ने साफ लिखा कि यह बंगला किसी एक नाम पर ट्रांसफर नहीं होगा।
यह पूरे परिवार का घर रहेगा —
पहले परिवार का भी, दूसरे परिवार का भी।

क्योंकि उनके लिए यह दीवारें, फर्श और छत से ज्यादा एक साझा इतिहास थी।
वो समझते थे कि अगर भविष्य में कोई विवाद होगा, तो यह घर सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा। इसलिए उन्होंने पहले ही उसकी दिशा तय कर दी:

“यह घर विरासत है, विवाद नहीं।”

लोनावला फार्म हाउस: दिल से किसान धर्मेंद्र का सबसे निजी कोना

लोनावला का लगभग 100 एकड़ का फार्म हाउस धर्मेंद्र की असली पहचान को दिखाता था। वे कहते थे –
“दिल से मैं आज भी किसान ही हूं।”

वसीयत में उन्होंने यह पूरा फार्म हाउस प्रकाश कौर और उनके बच्चों के नाम किया।
यह वही जगह थी जहां सनी और बॉबी ने बचपन की दौड़ लगाई, जहां त्योहारों पर पूरा परिवार इकट्ठा होता, जहां धर्मेंद्र पेड़ों के बीच घूमते, मिट्टी छूते हुए खुद को गांव वाला धर्म सिंह देओल महसूस करते थे।

यह फैसला किसी राजनीति या दबाव का नहीं, बल्कि रिश्ते और यादों का था।

‘विजेता फिल्म्स’: सपनों से शुरू हुई विरासत की नींव

धर्मेंद्र का प्रोडक्शन हाउस विजेता फिल्म्स भी उनकी वसीयत में अहम जिक्र के साथ आता है।
यह सिर्फ पैसा कमाने की कंपनी नहीं थी, यह एक पिता के सपने का नाम था।

– इसी बैनर से ‘बेताब’ बनी, जिसने सनी को स्टार बना दिया।
– फिर ‘घायल’ ने उन्हें एक्शन आइकॉन बना दिया।

फिल्मों से आई कमाई को उन्होंने रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और दूसरे बिज़नेस में लगाया।
इसी वजह से आज देओल परिवार के पास जो भी मजबूत आर्थिक आधार है, उसकी जड़ कहीं न कहीं विजेता फिल्म्स से ही जुड़ी है।

कारों का शौक: रॉयल नहीं, रिश्ता जोड़ने वाला

धर्मेंद्र को कारों से प्यार था, लेकिन किसी नवाबी अंदाज़ में नहीं।
उन्हें ऐसी कारें पसंद थीं जिनमें वह स्टूडियो से जूहू, जूहू से फार्म हाउस, देर रात शूटिंग से घर लौटते हुए हवा को महसूस कर सकें।

Fiat से लेकर Mercedes तक, उन्होंने कई क्लासिक और लग्जरी कारें रखीं।
आज भी देओल परिवार के गैरेज में उनकी कुछ पसंदीदा कारें सिर्फ वाहन नहीं, याद की तरह खड़ी हैं।

धर्मेंद्र की सील बंद वसीयत ने दिखाया – दो परिवार, एक विरासत। जूहू के बंगले से लोनावला फार्म हाउस तक, हर फैसले में था सिर्फ प्यार और सम्मान।


वसीयत की सबसे बड़ी लाइन: “दो परिवार नहीं, एक विरासत”

अगर इस पूरी वसीयत को एक लाइन में समझना हो, तो वह यह है –
“दो परिवार नहीं, एक विरासत।”

उन्होंने अपनी गलती भी स्वीकार की, अपने फैसलों की कीमत भी चुकाई,
लेकिन आख़िर तक यही कोशिश की कि उनके जाने के बाद घर टूटे नहीं।

आज जब आम लोग भी अपने घरों में जायदाद को लेकर झगड़े करते हैं,
भाई-भाई कोर्ट तक पहुंच जाते हैं,
माता-पिता के नाम पर बने घर पर बहन तक को हिस्सा नहीं देते,

तब धर्मेंद्र की यह वसीयत एक बड़ी सीख बनकर सामने आती है कि –
कितना भी पैसा कमा लो,
आख़िर में याद वही इंसान रहता है
जिसने दिल से बांटा हो,
इज़्ज़त से फैसले लिए हों,
और रिश्तों को जोड़कर रखा हो।

धर्मेंद्र ने अपने आखिरी कागज़ पर सिर्फ हस्ताक्षर नहीं किए,
उन्होंने यह संदेश लिख दिया कि—

“दौलत खत्म हो सकती है,
लेकिन इज़्ज़त और संबंध – यही असली विरासत है।”

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