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89 की उम्र में धर्मेंद्र का निधन, बॉलीवुड ने खोया अपना असली ही-मैन
मुंबई में अंतिम सांसें लेकर विदा हुए दिग्गज अभिनेता, ‘शोले’ से ‘सत्यकाम’ तक 60 साल का शानदार सफर
भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसे कलाकार बहुत कम हुए हैं, जिनका नाम लेते ही लोगों की आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान आ जाए। धर्मेंद्र, जिन्हें प्यार से ‘ही-मैन ऑफ बॉलीवुड’ कहा जाता है, सोमवार सुबह मुंबई में 89 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। परिवार के करीबियों और पुलिस सूत्रों ने जानकारी दी कि उनका अंतिम संस्कार विले पार्ले स्थित पवन हंस श्मशान घाट पर किया गया, जहां फिल्म जगत की कई हस्तियां उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचीं।
धर्मेंद्र पिछले कुछ महीनों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। अक्टूबर में सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी टीम ने उस वक्त कहा भी था कि वह ठीक हैं और सिर्फ मेडिकल ऑब्जर्वेशन के लिए अस्पताल में रहना चाहते हैं। इसी साल उनकी आंखों की कॉर्नियल ट्रांसप्लांट सर्जरी भी हुई थी।
लेकिन इससे पहले कि उनका 90वां जन्मदिन—8 दिसंबर—जोरदार तरीके से मनाया जाता, किस्मत ने एक शांत विदाई चुन ली। सोशल मीडिया पर फैन्स, सेलेब्स और फिल्म समीक्षकों के संदेश यह साफ बताते हैं कि धर्मेंद्र सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि पीढ़ियों की यादों का हिस्सा थे।
300 से अधिक फिल्मों का सफर
धर्मेंद्र का करियर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। 1960 के दशक में ‘अनपढ़’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों से शुरुआत करने वाले धर्मेंद्र ने ‘शोले’, ‘चुपके चुपके’, ‘सीता और गीता’, ‘राम बलराम’, ‘यकीन’, ‘धरम वीर’ और ‘हकीकत’ जैसी फिल्मों से भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
एक तरफ जहां ‘वीरू’ जैसे हल्के-फुल्के रोल में उनकी मासूमियत दिखती थी, वहीं ‘सत्यकाम’ में उनका भावनात्मक और गहन अभिनय आज भी दर्शकों के लिए एक मास्टरक्लास है।

स्टारडम से परे—एक जिंदादिल इंसान
धर्मेंद्र की सबसे बड़ी खूबी यही थी—वह स्टार होकर भी आम आदमी की तरह रहते थे। सेट पर स्पॉटबॉयज़ से लेकर फैन्स तक, सभी से उसी गर्मजोशी से मिलते थे। बॉलीवुड में आज भी कई युवा अभिनेता बताते हैं कि उनसे मिलकर ऐसा लगता था जैसे कोई पुराना दोस्त अचानक गले लग गया हो।
हाल ही में एक फिल्ममेकर ने याद किया कि धर्मेंद्र ने शूटिंग के दौरान अचानक चाय बनाकर सेट पर सभी को पिलाई थी—क्योंकि उन्हें लगा कि सब थके हुए हैं। यह उनका दिल था—बड़ा, संवेदनशील और बेफिक्र।
परिवार, विरासत और यादें
धर्मेंद्र की विरासत सिर्फ उनकी फिल्मों में नहीं, बल्कि उनके परिवार में भी दिखाई देती है—सनी देओल, बॉबी देओल, हेमा मालिनी और उनकी पोती करण देओल—सबने अपने-अपने तरीके से सिनेमा में जगह बनाई।
लेकिन असली विरासत वह भावना है—ईमानदारी, सादगी और मेहनत—जिसने उन्हें लाखों दिलों का प्रिय बना दिया।
धर्मेंद्र का जाना भारतीय सिनेमा के लिए एक खालीपन है। पर उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़, उनकी फिल्मों के संवाद और उनकी छवि हमेशा जीवित रहेगी—टीवी स्क्रीन पर, थिएटर में, परिवारों की यादों में और इतिहास की किताबों में।
कहते हैं—कुछ लोग कभी नहीं मरते। धर्मेंद्र उन्हीं में से एक हैं।
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