Bollywood
“लाइफ अपने हिसाब से जीता है” Akshay Khanna को लेकर Arshad Warsi का खुलासा आखिर कैसे रहते हैं वो इतने अनबदर
PR से दूरी और लाइमलाइट से बेपरवाह रहना कमजोरी नहीं मानसिक संतुलन का संकेत है एक्सपर्ट ने समझाया पूरा मनोविज्ञान
आज के दौर में जहां सोशल मीडिया लाइक्स, ट्रोलिंग और दूसरों की राय ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है, वहीं किसी का वाकई अनबदर रहना लोगों को हैरान भी करता है और आकर्षित भी। हाल ही में यही चर्चा तब शुरू हुई जब अभिनेता Arshad Warsi ने अपने पुराने को-स्टार Akshaye Khanna की पर्सनैलिटी को लेकर बेहद साफ और ईमानदार बातें कहीं।
अरशद वारसी, जिन्होंने अक्षय खन्ना के साथ 2009 की फिल्म Short Kut में काम किया था, हाल ही में Lallantop से बातचीत में अपने अनुभव साझा कर रहे थे। बातचीत के दौरान जब फिल्म की असफलता और क्रिएटिव फैसलों पर चर्चा हुई, तो अरशद ने अक्षय खन्ना की ज़िंदगी को देखने का नजरिया भी सबके सामने रख दिया।
“वो अपनी ही दुनिया में रहता है”
अरशद वारसी ने अक्षय खन्ना के बारे में कहा,
“अक्षय बहुत सीरियस आदमी है। एक्टर तो वो शुरू से ही बेहतरीन रहा है, इसमें कभी शक नहीं था। लेकिन वो अपनी ही दुनिया में रहता है।”
अरशद यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे जोड़ा,
“उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप उसके बारे में क्या सोचते हैं। उसका मानना है कि ये उसकी ज़िंदगी है, आप मेरे बारे में क्या सोचते हो या नहीं सोचते हो, वो मेरी समस्या नहीं है। वो अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीता है।”

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अरशद ने साफ कहा कि अक्षय खन्ना कभी भी PR, इमेज-बिल्डिंग या शो-ऑफ में विश्वास नहीं करते। यह उनकी कोई नई आदत नहीं, बल्कि ज़िंदगी भर का स्वभाव है।
धुरंधर की सफलता, फिर भी लाइमलाइट से दूरी
हाल ही में फिल्म Dhurandhar में रहमान डकैत के किरदार के लिए अक्षय खन्ना की जमकर तारीफ हुई। क्रिटिक्स से लेकर दर्शकों तक, सभी ने उनकी परफॉर्मेंस को दमदार बताया। इसके बावजूद, अक्षय ने न तो प्रमोशनल इंटरव्यूज़ की बाढ़ लगाई और न ही सोशल मीडिया पर खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
यही रवैया आज के समय में लोगों को सबसे ज्यादा हैरान करता है — जब काम बोले, लेकिन इंसान खुद शोर न मचाए।
अनबदर रहना क्या सच में संभव है?
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, “अनबदर” होना लोगों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना नहीं है। यह एक मानसिक संतुलन है, जहां इंसान यह तय करता है कि किस राय को महत्व देना है और किसे छोड़ देना है।
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने का मतलब यह नहीं कि आप फीडबैक या सुधार की गुंजाइश को ठुकरा दें। इसका मतलब है कि आप खुद की पहचान दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर नहीं करते।
अक्षय खन्ना का उदाहरण यही दिखाता है — काम के प्रति गंभीरता, निजी जीवन में सादगी और बेवजह की भागदौड़ से दूरी।
क्यों आज ये सोच ज़्यादा जरूरी हो गई है
आज जब तुलना, दबाव और दिखावे की संस्कृति हावी है, तब “मुझे फर्क नहीं पड़ता” वाली सोच कई लोगों के लिए सुकून का रास्ता बन सकती है। अक्षय खन्ना की तरह अपनी सीमाएं तय करना और ज़रूरी चीज़ों पर ही ध्यान देना मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।
अरशद वारसी के शब्दों में कहें तो,
“लाइफ अपने हिसाब से जीना” शायद आज के समय की सबसे बड़ी लक्ज़री बन चुका है।
और पढ़ें- DAINIK DIARY
