Air Accidents
AI 171 हादसे के अकेले बचे यात्री की दर्दभरी कहानी – ‘मैं अब किसी से बात नहीं करता’
260 लोगों की जान लेने वाले एयर इंडिया हादसे में 11A सीट पर बैठे विश्वाश कुमार का जिंदा बचना किसी चमत्कार से कम नहीं, आज भी झेल रहे मानसिक और शारीरिक दर्द
12 जून की वो रात, जिसे एयर इंडिया फ्लाइट AI 171 के यात्री शायद कभी भूल नहीं पाएंगे। लंदन-गैटविक जा रही इस फ्लाइट का अहमदाबाद में क्रैश हो जाना 241 यात्रियों और 19 ज़मीन पर मौजूद लोगों के लिए मौत का सबब बना। लेकिन उस विनाशकारी हादसे के मलबे से एकमात्र जीवित व्यक्ति निकला — नाम था विश्वाश कुमार रमेश, जो उस दिन सीट 11A पर बैठे थे।
विश्वाश, जो अब ब्रिटेन के लीसेस्टर में रहते हैं, आज भी उस दिन की यादों से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे। उन्होंने BBC News से बातचीत में कहा, “मैं सिर्फ एक ही सर्वाइवर हूं। अब भी यकीन नहीं होता कि मैं बच गया। यह एक चमत्कार था। लेकिन मैंने अपने भाई अजय को खो दिया… वो मेरा सहारा था।”
उनकी आंखें भर आईं जब उन्होंने कहा कि अब वो ज़्यादातर वक्त अपने कमरे में अकेले रहते हैं। “मैं अपनी पत्नी और बेटे से बात नहीं करता। बस अकेले रहना अच्छा लगता है। रातभर सोचता रहता हूं, नींद नहीं आती।”

परिवार में पसरा सन्नाटा
विश्वाश के पिता रमेश कुमार भालैया, जो दीव के एक मछुआरा परिवार से हैं, अपने बेटे अजय का शव पहचानने के लिए भारत आए थे। इस हादसे में उनके गांव पटेलवाड़ी के 14 लोग मारे गए, जिनमें 4 ब्रिटिश नागरिक भी शामिल थे।
मां दह्याबेन आज भी घर के बाहर दरवाज़े पर बैठी रहती हैं, लेकिन किसी से बात नहीं करतीं। परिवार की हालत मानसिक और आर्थिक, दोनों ही रूप से बेहद खराब है।
एयर इंडिया से नाराज़गी और उम्मीदें
परिवार ने बताया कि एयर इंडिया ने उन्हें अब तक केवल £21,500 (करीब 22 लाख रुपये) का अंतरिम मुआवज़ा दिया है, जो उनकी जरूरतों के हिसाब से बहुत कम है। परिवार के प्रवक्ता रैड सिगर ने कहा, “हमने एयर इंडिया से तीन बार बैठक की अपील की, लेकिन हर बार या तो जवाब नहीं मिला या मना कर दिया गया।”
सिगर ने कहा, “यह बेहद शर्मनाक है कि हमें मीडिया के ज़रिए अपील करनी पड़ रही है। एयर इंडिया के अधिकारियों को हमारे साथ बैठकर समाधान निकालना चाहिए, लेकिन अब तक उन्होंने सिर्फ औपचारिकता निभाई है।”
कंपनी का जवाब
टाटा ग्रुप के स्वामित्व वाली एयर इंडिया ने बयान जारी करते हुए कहा कि उन्होंने विश्वाश के प्रतिनिधियों से बैठक का प्रस्ताव पहले ही भेजा था और आगे भी बातचीत के लिए तैयार हैं। लेकिन परिवार का कहना है कि अब उन्हें भरोसा नहीं रहा, क्योंकि वे पहले से तीन बार ऐसा आश्वासन सुन चुके हैं।
“हर दिन एक दर्द भरा सपना”
विश्वाश कहते हैं, “मेरा शरीर अब भी ठीक नहीं है। चल नहीं पाता, पत्नी सहारा देती है। मैं काम पर नहीं जा पाता, गाड़ी नहीं चला पाता। हर दिन मुझे वही दिन याद आता है जब मैं और मेरा भाई साथ बैठे थे — और कुछ सेकंड में सब खत्म हो गया।”

उनके शब्दों में सिर्फ दर्द नहीं, बल्कि एक ऐसी खामोशी भी झलकती है जो किसी हादसे से गुज़रने वाले इंसान के भीतर की टूटन बयां करती है।
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