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H-1B वीज़ा फीस विवाद पर ट्रंप प्रशासन का नया ऐलान – भारतीय छात्रों और पेशेवरों को मिली बड़ी राहत
अमेरिका में पहले से रह रहे छात्र और कर्मचारियों को नहीं देना होगा $100,000 की भारी फीस, केवल नए बाहरी आवेदकों पर लागू होगा नियम
वॉशिंगटन डीसी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने सोमवार को जारी दिशा-निर्देशों में H-1B वीज़ा धारकों और छात्रों के लिए एक बड़ी राहत की घोषणा की है। अमेरिका की USCIS (United States Citizenship and Immigration Services) ने स्पष्ट किया है कि जो विदेशी छात्र अमेरिका में पहले से रह रहे हैं और अपनी वीज़ा श्रेणी बदलकर H-1B स्टेटस में जा रहे हैं, उन्हें $100,000 की नई फीस नहीं देनी होगी।
यह फैसला खासकर भारतीय छात्रों और आईटी सेक्टर के कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि पिछले महीने ट्रंप प्रशासन ने 19 सितंबर को एक विवादास्पद घोषणा की थी, जिसमें H-1B प्रोग्राम पर भारी फीस लागू करने की बात कही गई थी।
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क्या कहा ट्रंप प्रशासन ने?
USCIS की नई गाइडलाइन के मुताबिक —
“यह फीस केवल उन मामलों में लागू होगी जहां आवेदन अमेरिका से बाहर से किया जा रहा है या आवेदक को देश छोड़ना होगा और फिर प्रवेश के लिए नया आवेदन देना होगा।”
इसका मतलब है कि अमेरिका में रह रहे छात्र जो F-1 वीज़ा (स्टूडेंट वीज़ा) से H-1B वर्क वीज़ा में बदल रहे हैं या जो पहले से किसी कंपनी में कार्यरत हैं, उन्हें यह फीस नहीं देनी होगी।
USCIS ने यह भी कहा कि यह आदेश केवल 21 सितंबर 2025 के बाद दायर किए गए नए आवेदनों पर लागू होगा। पहले से कार्यरत H-1B धारकों के देश से बाहर जाने और लौटने पर कोई रोक नहीं होगी।

किन पर लागू होगा नया शुल्क?
नई नीति के अनुसार, यह भारी $100,000 फीस केवल उन्हीं पर लागू होगी:
- जो आवेदक अमेरिका के बाहर से H-1B के लिए आवेदन कर रहे हैं।
- जिनकी याचिका “कांसुलर नोटिफिकेशन” या “प्री-फ्लाइट इंस्पेक्शन” जैसी प्रक्रियाओं के तहत आती है।
USCIS ने इसके लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू किया है, जहां यह फीस जमा की जा सकती है।
भारतीय छात्रों को राहत क्यों?
अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्र जो F-1 वीज़ा पर हैं, अब H-1B में स्टेटस बदलने पर इस फीस से मुक्त रहेंगे। इसके अलावा L-1 वीज़ा पर कार्यरत पेशेवर, जिन्हें मल्टीनेशनल कंपनियां भारत से अमेरिका भेजती हैं, वे भी इस नियम से बाहर रहेंगे।
L-1 वीज़ा और F-1 वीज़ा दोनों गैर-आप्रवासी श्रेणियां हैं — F-1 छात्रों के लिए जबकि L-1 कंपनियों के कर्मचारियों के लिए होता है।
ट्रंप प्रशासन की नई घोषणा से सिलिकॉन वैली की कई कंपनियों और भारतीय आईटी दिग्गजों जैसे Infosys, Tata Consultancy Services (TCS) और Wipro को भी राहत मिलेगी, क्योंकि ये कंपनियां हजारों भारतीय कर्मचारियों को H-1B वीज़ा पर अमेरिका भेजती हैं।
लेकिन नई नीति में छूट सीमित है
हालांकि राहत के बावजूद यह छूट सीमित है। ट्रंप प्रशासन ने कहा कि कोई “ब्लैंकेट छूट” (Blanket Waiver) नहीं दी जाएगी। यानी कंपनियां यदि यह साबित कर दें कि किसी विशेष विदेशी कर्मचारी की उपस्थिति “राष्ट्रीय हित” (National Interest) में है और उसके स्थान पर कोई अमेरिकी उपलब्ध नहीं है, तभी उन्हें शुल्क में राहत मिल सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ा सकती है क्योंकि आईटी और हेल्थकेयर सेक्टर में पहले से ही योग्य कर्मचारियों की कमी है।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
इमिग्रेशन विशेषज्ञ सुसान कोहेन के अनुसार,
“यह गाइडलाइन ट्रंप प्रशासन के भीतर भ्रम को दूर करने की दिशा में पहला कदम है, लेकिन इससे विदेशी पेशेवरों की असुरक्षा खत्म नहीं हुई है।”
वहीं भारतीय मूल के अमेरिकी वकील श्रीधर कृष्णमूर्ति का कहना है,
“ट्रंप सरकार का यह कदम अमेरिकी तकनीकी उद्योग को प्रभावित कर सकता है। यह फीस उन कंपनियों पर बोझ डालेगी जो भारत जैसे देशों से उच्च कौशल वाले कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं।”
निष्कर्ष
ट्रंप प्रशासन का यह नया स्पष्टीकरण भारत समेत कई देशों के छात्रों और कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है। हालांकि, यह साफ है कि वीज़ा पॉलिसी अभी भी अमेरिका की घरेलू राजनीति और रोजगार सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूम रही है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नीति आगे बदलती है या फिर H-1B प्रोग्राम पर नियंत्रण और सख्त होता है।
