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बांग्लादेश में भूचाल: शेख हसीना को ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ में फांसी की सज़ा, उठे निष्पक्ष न्याय पर सवाल
छात्र आंदोलन पर कथित दमन के आरोप में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना दोषी करार, अदालत से बाहर भी माहौल तनावपूर्ण।
बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल में है। देश की सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाली पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल (ICT-BD) ने मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में फांसी की सज़ा सुनाई है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश पिछले एक साल से छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों, राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता के लगातार खींचतान से जूझ रहा है।
हसीना ने फैसले के बाद कहा कि उन्हें “अपना पक्ष रखने का निष्पक्ष मौका नहीं दिया गया”, और यह फैसला राजनीतिक बदले की कार्रवाई जैसा लगता है। उनकी ये टिप्पणी कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा पहले से उठाए जा रहे सवालों को और मजबूत करती है।
छात्र आंदोलन से शुरू हुआ तूफान
बीते वर्ष ढाका, चिटगांव और राजशाही जैसी बड़ी यूनिवर्सिटी कैंपसों में तेज़ी से फैले छात्र आंदोलन ने देश की राजनीति की दिशा बदल दी थी।
आरोप है कि आंदोलन के दौरान छात्रों पर कठोर कार्रवाई और गोलीबारी का आदेश सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी हुआ था। इस हिंसा में बड़ी संख्या में छात्र घायल हुए और कई की मौत की भी पुष्टि हुई।
ICT-BD ने अपने फैसले में कहा कि “सरकारी आदेशों के अनुसार सुरक्षा बलों ने जानबूझकर छात्रों को निशाना बनाया,” और इसका सीधा जिम्मेदाराना शेख हसीना, तत्कालीन गृहमंत्री असदुज्ज़मान खान कमाल, और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून पर डाला गया है।

राष्ट्र की राजनीति में गहरा ध्रुवीकरण
बांग्लादेश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से अस्थिरता बढ़ती जा रही है। हसीना की गिरफ्तारी और सज़ा ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया है। उनकी पार्टी के कई समर्थक इस फैसले को “राजनीतिक बदले की कार्यवाही” बता रहे हैं।
ढाका यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर, जिन्होंने नाम न बताने की शर्त पर बात की, कहते हैं—
“बांग्लादेश इस समय ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां न्याय, राजनीति और जनता का विश्वास तीनों की परीक्षा हो रही है।”
देश की सड़कों पर मौजूद भीड़ और सोशल मीडिया पर चल रही बहसें साफ दिखाती हैं कि फैसला केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि बांग्लादेश की लोकतांत्रिक संरचना के भविष्य से जुड़ा सवाल भी है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया तेज़
भारत, अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानवाधिकार समूह इस फैसले की पारदर्शिता पर नजर बनाए हुए हैं।
कुछ देशों ने इसे “ऐतिहासिक” बताया है, तो कई ने “न्यायिक प्रक्रिया में खामियों” की ओर इशारा किया है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला आने वाले महीनों में दक्षिण एशिया की कूटनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
विशेषकर भारत-बांग्लादेश संबंध, जो लंबे समय से सुरक्षा, व्यापार और नदी जल विवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़े हैं।
आगे क्या?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हसीना के पास अपील का विकल्प मौजूद है, लेकिन ICT-BD के फैसलों में बदलाव की संभावना बेहद कम होती है।
दूसरी ओर, विपक्ष इस फैसले को “नए राजनीतिक समीकरण का संकेत” बता रहा है।
हसीना की सज़ा के साथ बांग्लादेश की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—जहाँ लोकतंत्र, अधिकारों और न्याय प्रणाली की मजबूती फिर से बहस का केंद्र बन गई है।
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