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‘₹2 करोड़ के बकाया’ और ‘Swachhata Monitor’ प्रोजेक्ट की पूरी कहानी: कौन था मुंबई होस्टेज कांड का आरोपी रोहित आर्या?
17 बच्चों को बंधक बनाकर सनसनी मचाने वाला रोहित आर्या खुद को सरकारी प्रोजेक्ट का डायरेक्टर बताता था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने उसके ₹2 करोड़ के ‘बकाया’ दावे को झूठा बताया।
मुंबई के पवई इलाके में गुरुवार को हुआ 17 बच्चों का बंधक कांड देशभर में चर्चा का विषय बन गया। आरोपी रोहित आर्या, जिसने तीन घंटे तक बच्चों को बंदूक और ज्वलनशील स्प्रे के दम पर बंधक बनाया, पुलिस की गोली से मारा गया। लेकिन सवाल यह उठता है — आखिर वह कौन था और क्या वाकई सरकार उस पर ₹2 करोड़ की रकम बकाया थी, जैसा उसने दावा किया?
“मैं आतंकवादी नहीं हूं…” — रोहित आर्या का आखिरी वीडियो
बंधक संकट के दौरान आर्या ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें उसने कहा था,
“मैं आतंकवादी नहीं हूं, मेरे कोई गलत इरादे नहीं हैं। मैंने ये कदम इसलिए उठाया है क्योंकि मुझे सरकार से ₹2 करोड़ रुपये लेने हैं। मेरी मांग नैतिक है, मैं बस जवाब चाहता हूं।”
वीडियो में वह बेहद शांत स्वर में बोलता दिखा। उसने कहा कि उसका मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अपनी मेहनत की रकम वसूल करना है।

कौन था रोहित आर्या?
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 50 वर्षीय रोहित आर्या पुणे का रहने वाला था और खुद को एक फिल्ममेकर और सोशल प्रोजेक्ट डायरेक्टर बताता था। उसने Apsara Media Entertainment Network नाम की कंपनी बनाई थी, जिसके तहत वह Project Let’s Change – PLA Swachhata Monitor चलाता था।
यह प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के प्राथमिक शिक्षा विभाग द्वारा 2022 में शुरू की गई ‘माझी शाला, सुंदर शाला’ पहल के अंतर्गत स्वीकृत किया गया था।
स्वच्छता मॉनिटर प्रोजेक्ट क्या था?
इस योजना का मकसद स्कूलों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। आर्या के मुताबिक, उसने सरकार के लिए लघु फिल्में, विज्ञापन और डिजिटल सामग्री बनाई थी, लेकिन भुगतान नहीं मिला।
पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर के कार्यकाल (2022–2024) में आर्या को यह प्रोजेक्ट पायलट आधार पर दिया गया था। केसरकर के अनुसार, उन्होंने निजी तौर पर भी कुछ रकम आर्या को दी थी जब उसने शिकायत की कि शिक्षा विभाग भुगतान रोक रहा है।
आर्या का ‘₹2 करोड़ बकाया’ विवाद
आर्या ने दावा किया कि सरकार ने उसके प्रोजेक्ट का पूरा भुगतान नहीं किया। उसने आजाद मैदान और केसरकर के सरकारी बंगले के बाहर कई बार धरना दिया था। सोशल मीडिया पर उसके पोस्ट लगातार “Justice for Swachhata Monitor” जैसे हैशटैग के साथ सामने आते थे।
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हालांकि, महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग ने उसकी बात को पूरी तरह गलत और आधारहीन बताया है।
सरकार का जवाब: “कोई दस्तावेज नहीं थे”
घटना के कुछ घंटे बाद महाराष्ट्र शिक्षा विभाग ने आधिकारिक बयान जारी किया। बयान के अनुसार —
- रोहित आर्या ने जिन बकाया राशि का दावा किया, उसके समर्थन में कोई वैध दस्तावेज या बिल पेश नहीं किए।
- उसने स्कूलों से Swachhata Monitor 2024–25 अभियान के लिए रजिस्ट्रेशन फीस ली थी, जो गैरकानूनी थी।
- विभाग ने उसे 23 अगस्त 2024 को पत्र लिखकर कहा था कि वह यह पैसा सरकारी खाते में जमा करे और फिर योजना का संशोधित प्रस्ताव पेश करे।
- लेकिन आर्या ने न तो रकम जमा की और न ही दस्तावेज प्रस्तुत किए, इसलिए आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।
कितना भुगतान हुआ था?
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक —
- सितंबर 2022 में आर्या की कंपनी को CSR प्रोजेक्ट के तहत मंजूरी दी गई थी।
- जून 2023 में ₹9.9 लाख की राशि उसके खाते में जारी भी की गई।
- 2023–24 में ₹2 करोड़ के नए बजट का प्रस्ताव मंजूर हुआ, लेकिन वित्तीय दस्तावेजों की कमी और तकनीकी खामियों के कारण योजना लागू नहीं हो पाई।
- इसके बाद आर्या ने ₹2.41 करोड़ का नया प्रस्ताव भेजा, जिसमें कई अनियमितताएँ पाई गईं।
“मानवता के नाते कुछ पैसे दिए” — दीपक केसरकर
पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर ने कहा,
“सरकारी नियमों के तहत बिना बिल या दस्तावेज के भुगतान नहीं हो सकता। जब रोहित ने मुझसे मदद मांगी, मैंने मानवीय दृष्टिकोण से उसे अपनी जेब से कुछ पैसे दिए। लेकिन उसे विभाग से दस्तावेज पूरे करवा कर ही भुगतान मिलना था।”
केसरकर ने यह भी कहा कि आर्या को कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी, न कि बच्चों को बंधक बनाकर हिंसक रास्ता चुनना चाहिए था।

परिवार की आर्थिक तंगी और मानसिक दबाव
आर्या की पत्नी अंजलि आर्या ने मीडिया को बताया कि उनका परिवार पिछले कई महीनों से वित्तीय तंगी में था। “वह अपने काम को लेकर बेहद जुनूनी थे। सरकार से भुगतान न मिलने के कारण वे तनाव में आ गए थे। हमने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन वो टूट गए,” अंजलि ने कहा।
जब समाप्त हुआ खौफनाक अध्याय
तीन घंटे चले इस ड्रामे के बाद पुलिस ने सटीक योजना के तहत ऑपरेशन चलाया। एंटी-टेरर सेल के अधिकारी अमोल वाघमारे ने आर्या पर गोली चलाई, जो उसकी छाती में लगी। कुछ ही देर बाद उसे हिंदू हृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।
सभी 17 बच्चे सुरक्षित बाहर निकाले गए और परिजनों से मिलवाए गए।
निष्कर्ष: एक टूटे सपने की खतरनाक परिणति
रोहित आर्या की कहानी कई सवाल छोड़ गई — एक व्यक्ति जिसने सरकारी योजनाओं में योगदान दिया, लेकिन कागजी कार्यवाही और सिस्टम की उलझनों में फंस गया। क्या यह प्रशासनिक उदासीनता थी या एक व्यक्ति की मानसिक टूटन?
जो भी हो, इस घटना ने दिखाया कि पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी कभी-कभी एक इंसान को कितना चरम कदम उठाने पर मजबूर कर सकती है।

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