Economy
नेपाल में सोशल मीडिया बैन ने क्यों भड़का दिया गुस्सा और कैसे गिरी सरकार 30 हजार करोड़ की रेमिटेंस पर पड़ा असर
फेसबुक-व्हाट्सएप पर बैन से भड़के युवा, प्रवासी नेपाली परिवारों की जिंदगी पर पड़ा गहरा असर, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बदल दी सत्ता
नेपाल की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से भारी हलचल देखने को मिल रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि उसने न सिर्फ काठमांडू की सड़कों को भर दिया बल्कि सत्ता के गलियारों को भी हिला कर रख दिया। यह आग भड़की थी सरकार के उस फैसले से, जिसमें 26 सोशल मीडिया ऐप्स—जिनमें Facebook और WhatsApp भी शामिल थे—को बैन कर दिया गया।
प्रवासी नेपाली और सोशल मीडिया की अहमियत
नेपाल की आबादी का लगभग 8% हिस्सा विदेशों में रहकर काम करता है। इनमें से अधिकांश लोग खाड़ी देशों, मलेशिया और भारत में नौकरी करते हैं। उनके भेजे हुए पैसे यानी रेमिटेंस नेपाल की GDP का लगभग 33% हिस्सा हैं—जो दुनिया में सबसे ऊंची दरों में से एक है। यही वजह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उनके लिए सिर्फ चैटिंग ऐप्स नहीं बल्कि परिवार से जुड़े रहने का एक अहम जरिया थे।
जब अचानक इन ऐप्स को बैन किया गया तो लाखों परिवार अपने प्रियजनों से संपर्क खो बैठे। इस कदम को लोगों ने अपनी आवाज़ दबाने और भ्रष्टाचार की फाइलों पर परदा डालने की साजिश माना।

गुस्से की वजहें
युवा वर्ग पहले से ही आर्थिक ठहराव और बेरोजगारी से परेशान था। जब उन्हें यह दिखा कि नेता और उनके परिवार सोशल मीडिया पर ऐशो-आराम की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं, तो गुस्सा और बढ़ गया।
उसी दौरान एक अफवाह भी फैली कि नेपाल की दो सबसे बड़ी पार्टियां भ्रष्टाचार जांच से बचने के लिए ग्रैंड कोएलिशन बनाने जा रही हैं। इस खबर ने आंदोलन को और भड़का दिया।
युवाओं का जनसांख्यिकीय दबाव
नेपाल की कुल जनसंख्या 3 करोड़ है, जिसमें से 40% लोग 16-40 वर्ष की उम्र के हैं। यह युवा शक्ति अगर सही दिशा में लगाई जाए तो आर्थिक विकास की रफ्तार तेज कर सकती थी। लेकिन रोजगार के अवसर न मिलने और बड़े पैमाने पर ब्रेन ड्रेन होने से हालात बिगड़ते चले गए। खेती-बाड़ी की जमीनें खाली पड़ी हैं क्योंकि युवा विदेश जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
Table of Contents
अर्थव्यवस्था की चुनौतियां
विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि 1996 से 2023 तक नेपाल की अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर सिर्फ 4.2% रही, जो दक्षिण एशिया के अन्य देशों से काफी कम है। उद्योग-धंधों में गिरावट, कमज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यटन क्षेत्र की धीमी गति ने भी रोजगार संकट को गहराया।
हालांकि रेमिटेंस के कारण गरीबी में कमी आई है—1995 में जहां 90% लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, वहीं 2023 में यह आंकड़ा 50% से नीचे आ गया। लेकिन इस पर अत्यधिक निर्भरता ने देश को और असुरक्षित बना दिया है।
सोशल मीडिया बैन क्यों बना चिंगारी
सोशल मीडिया बैन सिर्फ एक टेक्निकल फैसला नहीं था, बल्कि आम जनता के लिए यह उनके रिश्तों और उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी पर हमला जैसा लगा। इसने उस घाव पर नमक छिड़कने का काम किया, जो पहले से ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आर्थिक ठहराव से पीड़ित था। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि सरकार को गिरना पड़ा।
For more Update http://www.dainikdiary.com
