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इस साल आम कितना मीठा कितना महंगा जानिए फसल मंडी और मौसम का पूरा गणित
कहीं बंपर पैदावार, कहीं नुकसान! उत्तर से दक्षिण तक कैसे बदला फलों के राजा का हाल — कीमत से लेकर निर्यात तक की पूरी रिपोर्ट
भारत में गर्मियों का मतलब सिर्फ चिलचिलाती धूप नहीं, बल्कि आम की मिठास भी है। लेकिन 2025 में इस मिठास पर मौसम और कीटों ने कई जगह पानी फेर दिया। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बागानों में जहां बंपर फसल ने किसानों को राहत दी, वहीं दक्षिण भारत के बागवान कीट और ओलावृष्टि से परेशान नजर आए।
उत्तर भारत में रिकार्ड उत्पादन — किसानों के चेहरे पर मुस्कान
मलिहाबाद का दशहरी हो या सहारनपुर का लंगड़ा, उत्तर प्रदेश में इस साल बाग खिले हुए हैं। अच्छी पैदावार ने लोकल मंडियों में रौनक बढ़ा दी। वहीं महाराष्ट्र का हापुस यानी अल्फोंसो, जिसने फिर से अपनी बादशाहत साबित की, उसकी अंतरराष्ट्रीय मांग भी मजबूत रही। हालांकि कुछ क्षेत्रों में असमय बारिश से नुकसान भी हुआ।
दक्षिण के किसानों की परेशानी — बंगनपल्ली पर कीटों का वार
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में बंगनपल्ली और तोतापुरी किस्मों को कीट और फफूंदी ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। किसानों ने बताया कि इस साल उत्पादन और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ा। इसके उलट, बिहार और बंगाल में हिमसागर और मालदह की पैदावार ने स्थानीय बाजारों को सस्ता और मीठा आम दिया।
महानगरों में कीमतों का खेल — आम आदमी की जेब पर असर
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे शहरों में आम की कीमतें ₹120 से ₹180 प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। दिल्ली में दशहरी और लंगड़ा 120-160 में बिक रहे हैं तो मुंबई में हापुस की कीमतें 150-180 के आसपास हैं। कोलकाता और पटना में मालदह और हिमसागर अब भी 50-90 में मिल रहे हैं।

निर्यात ने तोड़ी रिकॉर्ड — दुनिया में छाया भारतीय आम
2024 में भारत ने करीब 20% अधिक आम निर्यात किया। यूरोप, खाड़ी देशों और मध्य एशिया में हापुस, केसर और बंगनपल्ली की डिमांड बनी हुई है। उद्योग जानकारों के अनुसार 2030 तक भारत का आम उत्पादन 23.3 मिलियन टन तक पहुंचने की उम्मीद है।
दूधिया मालदह — बिहार का गर्व और GI टैग की राह
बिहार का दूधिया मालदह अपनी फाइबर-फ्री बनावट और दूध जैसी चमक के कारण खास है। स्थानीय कहावत है, “खालो मालदह, भूल जाओ हापुस।” इसे GI टैग दिलाने की कवायद तेजी से चल रही है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती — मिठास बनाए रखने की जंग
बारिश, लू और तापमान में उतार-चढ़ाव ने इस साल कई जगह आम के फूलों को झड़ा दिया। कीट और बीमारियों ने छोटे किसानों की कमर तोड़ दी। अब वक्त आ गया है कि टिकाऊ खेती और जलवायु संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए ताकि आने वाले सालों में फलों का राजा यूं ही मीठा बना रहे।