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क्या Mamata Banerjee अपना रही हैं सॉफ्ट हिंदुत्व बंगाल में मंदिरों की राजनीति के पीछे की पूरी कहानी
जगन्नाथ मंदिर से लेकर दुर्गा आंगन और महाकाल परियोजना तक ममता बनर्जी का मंदिर फोकस केवल आस्था नहीं बल्कि सियासी गणित और आर्थिक रणनीति से भी जुड़ा है
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ साफ नजर आने लगा है। वर्षों तक “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के आरोप झेलने वाली ममता बनर्जी अब लगातार मंदिर परियोजनाओं को लेकर सुर्खियों में हैं। सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह आस्था का विस्तार है या फिर सियासी मजबूरी के तहत अपनाया जा रहा “सॉफ्ट हिंदुत्व”।
दक्षिण बंगाल के दीघा में जगन्नाथ मंदिर का उद्घाटन, कोलकाता के न्यू टाउन इलाके में 17 एकड़ में बन रहे दुर्गा आंगन मंदिर और सांस्कृतिक परिसर की आधारशिला, और अब उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर परियोजना—इन तीनों कदमों ने ममता सरकार की रणनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
हाल ही में दुर्गा आंगन की नींव रखते हुए ममता बनर्जी ने साफ कहा कि वह सच्ची धर्मनिरपेक्ष हैं। उनके मुताबिक ऐसा कोई धर्म नहीं, जिसके पर्व या परंपराओं में वह शामिल न होती हों। गुरुद्वारे में सिर ढकना हो या रमज़ान में रोज़ा इफ्तार में जाना—हर धर्म की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना उनका सिद्धांत है। उन्होंने यह भी कहा कि जब वह किसी धर्म का सम्मान करती हैं तो उस पर सवाल क्यों उठते हैं।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस मंदिर अभियान के पीछे तृणमूल कांग्रेस को तीन बड़े फायदे दिख रहे हैं। पहला, हिंदू मतदाताओं के बीच यह संदेश देना कि पार्टी केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है। दूसरा, भारतीय जनता पार्टी के उस नैरेटिव को कमजोर करना, जिसमें तृणमूल पर लगातार “तुष्टिकरण की राजनीति” का आरोप लगाया जाता रहा है।

तीसरा पहलू आर्थिक है। बड़े मंदिर और सांस्कृतिक परिसर पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। दीघा का जगन्नाथ मंदिर पहले ही एक धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है। इसी तरह दुर्गा आंगन को सिर्फ पूजा स्थल नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति और विरासत को प्रदर्शित करने वाले केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे स्थानीय रोजगार और कारोबार को भी फायदा मिलने की उम्मीद है।
ममता बनर्जी का बयान—“मैं देवी दुर्गा से प्रार्थना करूंगी कि वह बुराई का नाश करें”—केवल धार्मिक संदेश नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। यह उस समय आया है जब बंगाल की राजनीति में हिंसा, पलायन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे बार-बार उठ रहे हैं।
साफ है कि ममता बनर्जी का मंदिर फोकस एकतरफा नहीं है। इसमें आस्था, राजनीति और विकास—तीनों का मेल दिखता है। इसे सॉफ्ट हिंदुत्व कहें या सांस्कृतिक संतुलन की कोशिश, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में यह रणनीति आने वाले समय में बड़ा असर डाल सकती है।
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