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बेलची से शुरू हुई थी इंदिरा गांधी की वापसी – बिहार चुनावों के बीच जयराम रमेश ने क्यों याद दिलाया वो पल
1977 में पराजय के बाद जब इंदिरा गांधी ने दलित परिवारों तक पहुँचने के लिए कीचड़, बारिश और हाथी की सवारी की थी, वही क्षण बना था उनकी राजनीतिक पुनर्जागरण की शुरुआत।
बिहार की राजनीति हमेशा से भारतीय इतिहास में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। 1974 में जब जयप्रकाश नारायण आंदोलन ने इंदिरा गांधी की सरकार को हिला दिया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ सालों बाद यही बिहार उनके राजनीतिक पुनर्जन्म का साक्षी बनेगा। 1977 के आम चुनावों में करारी हार के बाद जब कांग्रेस लगभग खत्म सी हो गई थी, उसी समय बिहार के एक छोटे से गाँव बेलची ने इतिहास की दिशा बदल दी।
बेलची का वह भयावह दिन
27 मई 1977 को बिहार के नालंदा जिले के बेलची गाँव में जातीय हिंसा का ऐसा भयावह मंजर सामने आया जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। एक मामूली झगड़े ने रूप लिया जातीय नरसंहार का — कुर्मी समुदाय के लोगों ने आठ दलितों और तीन पिछड़ी जाति सोनार समुदाय के लोगों की हत्या कर दी। जिन लोगों को जिंदा जलाया गया, उनके घर राख हो चुके थे और प्रशासन ने इसे “गैंगवार” कहकर टाल दिया।
इंदिरा गांधी का साहसिक सफर
ऐसे कठिन समय में जब कोई भी नेता वहाँ जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था, इंदिरा गांधी ने बिना सत्ता में हुए, जनता से जुड़ने का निर्णय लिया। अगस्त 1977 की तेज़ बारिश में उन्होंने कार, फिर जीप, फिर ट्रैक्टर और आखिर में हाथी पर सवार होकर बेलची का रुख किया। पत्रकारों के मुताबिक रास्ता इतना कीचड़ भरा था कि कई साथी रुक गए, लेकिन इंदिरा गांधी ने कहा – “मैं पानी में चल सकती हूँ, यह पहली बार नहीं जब मैं हाथी पर सवार हो रही हूँ।”

संसद में उठा मुद्दा
इस घटना ने न सिर्फ बिहार बल्कि संसद को भी हिला दिया। रामविलास पासवान जैसे युवा नेताओं ने इस पर आवाज़ उठाई और कहा कि यह “दलित बनाम सवर्ण युद्ध” था। जब तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इसे “गैंगवार” बताया, तो संसद में विरोध की लहर दौड़ पड़ी और सरकार को बयान वापस लेना पड़ा।
इंदिरा का पुनरुत्थान
बेलची यात्रा के बाद इंदिरा गांधी की छवि एक संवेदनशील और निर्भीक नेता के रूप में उभरी। अगले ही साल 1978 में उन्होंने चिकमंगलूर उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की, और 1980 तक वे फिर से प्रधानमंत्री बनीं। कांग्रेस ने उसी बिहार में वापसी की जहाँ से उसके पतन की शुरुआत हुई थी।
आज के सियासी संदर्भ में बेलची
2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान जब कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बेलची की याद दिलाई, तो उन्होंने सिर्फ अतीत नहीं दोहराया — बल्कि संदेश दिया कि जनता तक पहुँचने का साहस ही असली राजनीति है। आज जब जातीय समीकरणों, जनाधार और प्रचार के बीच सियासत जकड़ी हुई है, बेलची जैसी यात्राएँ हमें याद दिलाती हैं कि जनता का दिल जीतने के लिए जमीनी संवेदना ही सबसे बड़ा हथियार है।
निष्कर्ष
बेलची केवल एक गाँव नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में साहस, संवेदना और पुनर्जन्म का प्रतीक है। जिस महिला नेता को जनता ने सत्ता से बाहर किया था, वही जनता उसकी दृढ़ता से दोबारा उसके साथ खड़ी हो गई। शायद इसी वजह से जयराम रमेश जैसे नेता आज भी उस हाथी पर सवार इंदिरा गांधी की छवि को याद करते हैं — क्योंकि वो सिर्फ एक यात्रा नहीं, एक युग की शुरुआत थी।
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