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408 रन की करारी हार ने खोला टीम इंडिया की पोल – गौतम गंभीर की कोचिंग में घर का किला कैसे ढह गया?
न्यूज़ीलैंड के 3-0 व्हाइटवॉश के बाद साउथ अफ्रीका की 2-0 सीरीज़ जीत ने भारतीय टेस्ट टीम की कमजोरियों को उजागर कर दिया
भारतीय क्रिकेट में “घर में कोई हमें हरा नहीं सकता” जैसी कहावत अब पिछली यादों में बदलती दिख रही है। गौतम गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया ने लगातार दूसरी टेस्ट सीरीज़ घर में गंवा दी—पहले न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 3-0 का व्हाइटवॉश और अब साउथ अफ्रीका के खिलाफ शर्मनाक 2-0 की हार, जिसमें दूसरी टेस्ट में 408 रन का अंतर भारतीय क्रिकेट की सबसे दर्दनाक हारों में से एक बन गया।
कभी ‘फाइनल फ्रंटियर’, अब आसान निशाना?
एक समय था जब ईडन गार्डन्स, चेपॉक, फिरोज़शाह कोटला, वानखेड़े जैसे मैदान विदेशी टीमों के लिए ‘दुर्ग’ माने जाते थे। ऑस्ट्रेलिया के महान खिलाड़ी स्टीव वॉ ने भारत को “Final Frontier” कहा था और पूरी कोशिश के बावजूद कभी जीत नहीं पाए।
लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है।
- न्यूज़ीलैंड – बिना केन विलियमसन के
- साउथ अफ्रीका – बिना कागिसो रबाडा के
फिर भी दोनों टीमों ने भारत को उसी की धरती पर मात दे दी। यह आंकड़ा सिर्फ हार नहीं, बल्कि भारतीय टीम की मानसिक और तकनीकी कमजोरियों की ओर इशारा करता है।
गौतम गंभीर की कोचिंग पर बड़े सवाल
जब से गंभीर ने भारतीय टेस्ट टीम की जिम्मेदारी संभाली है, टीम का प्रदर्शन उल्टा रहा है। मैदान पर निर्णय लेने में हिचक, बैटिंग ऑर्डर की अस्थिरता और बेंच स्ट्रेंथ पर सही प्रयोग न होना—ये सब अब चर्चा में हैं।
यह पहली बार है जब भारतीय टीम को लगातार दो घरेलू टेस्ट सीरीज़ में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है।
बल्लेबाजी: तकनीक गायब, संयम खत्म
भारतीय टेस्ट बल्लेबाज़ी की धुरी कभी राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और चेतेश्वर पुजारा जैसे खिलाड़ियों से बनी थी। आज:
- चौथे-पाँचवें दिन टिककर खेलने वाला बल्लेबाज नहीं
- लंबे स्पेल का सामना करने की क्षमता नहीं
- स्पिन और रिवर्स स्विंग दोनों के सामने लड़खड़ाहट
गुवाहाटी टेस्ट के आखिरी दिन टीम का “ड्रॉ भी जीत जैसा है” कहना ही टीम के आत्मविश्वास का हाल बता रहा था, और कुछ घंटों में ही पूरी टीम बिखर गई।

गेंदबाज़ी: अकेले बुमराह कब तक?
जसप्रीत बुमराह ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की, लेकिन:
- स्पिनर विकेट नहीं निकाल पाए
- सपोर्ट पेसर्स प्रभावहीन रहे
- फील्डिंग में लगातार चूकें
एक समय भारत अपनी स्पिन जोड़ी के दम पर घर में विपक्षी टीमों को पस्त करता था, लेकिन अब वही स्पिनर्स विकेट के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
साउथ अफ्रीका की टीम ने दिखाया जज़्बा
रबाडा के बिना भी साउथ अफ्रीका की टीम:
- अधिक अनुशासित
- रणनीतिक रूप से मजबूत
- और लगातार दबाव बनाने वाली रही
उनकी फिल्डिंग, गेंदबाजी और बल्लेबाजी—तीनों विभाग भारत से बेहतर दिखे।
फैंस का सवाल – समस्या खिलाड़ियों में है या प्रबंधन में?
सोशल मीडिया पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं:
- चयन नीति क्यों उलझी हुई है?
- युवा खिलाड़ियों को लंबी रोप क्यों नहीं दी जा रही?
- अनुभवी खिलाड़ियों पर अधिक निर्भरता कब तक?
न्यूज़ीलैंड और साउथ अफ्रीका के खिलाफ दो शर्मनाक हारें यह दिखाती हैं कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट सिर्फ फॉर्म में नहीं है, बल्कि दिशा भी भटक चुकी है।
क्या टीम इंडिया वापसी कर पाएगी?
क्रिकेट में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन हार का तरीका चिंताजनक है। अब देखना होगा कि गंभीर और टीम मैनेजमेंट इस बड़े संकट को कैसे संभालते हैं।
अगली घरेलू सीरीज़ भारत के लिए ‘मेक या ब्रेक’ साबित हो सकती है।
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