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गौतम गंभीर के दौर में क्यों फिसल रही है टीम इंडिया की टेस्ट गाड़ी और BCCI से कौन पूछेगा असली सवाल
कोचिंग, चयन, पिच और शेड्यूल—भारत की टेस्ट गिरावट किसी एक चेहरे की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कहानी है
भारतीय क्रिकेट में शायद ही ऐसा कोई दौर रहा हो जब कोच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया हो। लेकिन जुलाई 2024 में गौतम गंभीर के भारतीय टीम का मुख्य कोच बनने के बाद हालात कुछ ऐसे ही बन गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर क्रिकेट स्टूडियो तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या भारत की टेस्ट टीम की गिरावट की असली वजह सिर्फ गंभीर हैं?
गंभीर का क्रिकेट करियर जुझारूपन, आक्रामक सोच और बड़े मौकों पर रन बनाने की मिसाल रहा है। 2007 टी20 वर्ल्ड कप फाइनल, 2011 वनडे वर्ल्ड कप फाइनल या फिर 2009 का नेपियर टेस्ट—हर जगह उन्होंने खुद को साबित किया। यही वजह थी कि BCCI ने उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम का हेड कोच बनाकर एक नई शुरुआत का संकेत दिया।
लेकिन 18 महीने बाद तस्वीर उम्मीदों के उलट नजर आ रही है।

टेस्ट क्रिकेट में गिरावट के आंकड़े बोलते हैं
गंभीर के नेतृत्व में भारत अब तक 19 टेस्ट मैच खेल चुका है, जिसमें सिर्फ 7 जीत, 10 हार और 2 ड्रॉ दर्ज हैं। जीत प्रतिशत 36.82 का है, जो बीते कोचों की तुलना में काफी कमजोर दिखता है।
जहां राहुल द्रविड़ और रवि शास्त्री जैसे कोचों के दौर में भारत टेस्ट क्रिकेट में मजबूत और आत्मविश्वास से भरा नजर आता था, वहीं अब टीम बार-बार बिखरती दिख रही है।
घरेलू जमीन पर हार और आत्मविश्वास का टूटना
न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू मैदान पर 0-3 से व्हाइटवॉश ने भारतीय टेस्ट क्रिकेट की नींव हिला दी। यह पहली बार था जब भारत को घर में तीन मैचों की सीरीज में क्लीन स्वीप झेलनी पड़ी। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और फिर दक्षिण अफ्रीका से मिली हार ने यह साफ कर दिया कि समस्या सिर्फ विदेशी दौरे तक सीमित नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया दौरे के बाद विराट कोहली और रोहित शर्मा का टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेना भी एक बड़े बदलाव की शुरुआत थी। इंग्लैंड दौरे पर शुभमन गिल की कप्तानी में 2-2 का ड्रॉ जरूर उम्मीद जगाने वाला था, लेकिन वह स्थायी नहीं साबित हो सका।
क्या सिर्फ गंभीर जिम्मेदार हैं?
आसान है उंगली उठाना। लेकिन क्या ईडन गार्डन्स में 124 रन का लक्ष्य न हासिल कर पाना सिर्फ कोच की गलती थी? जब यशस्वी जायसवाल, KL राहुल, ऋषभ पंत और रविंद्र जडेजा जैसे बल्लेबाज़ क्रीज पर टिक नहीं पाए, तो सवाल खिलाड़ियों की मानसिक मजबूती और मैच अवेयरनेस पर भी उठता है।
भारत की स्पिन खेलने की कला, जो कभी उसकी पहचान थी, अब खोती दिख रही है। घरेलू पिचों पर हल्का सा टर्न भी बल्लेबाज़ों को असहज कर देता है। यह वही गंभीर हैं जो खुद स्पिन के खिलाफ आक्रामक और समझदारी भरी बल्लेबाज़ी के लिए जाने जाते थे—अब उनकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने खिलाड़ियों को वही कला सिखा पाएं।

चयन, शेड्यूल और पिच—तीनों पर सवाल
गंभीर पर “गलत संयोजन” चुनने के आरोप लगे हैं, खासकर ऑलराउंडरों की अधिकता को लेकर। लेकिन चयन समिति के अध्यक्ष अजित अगरकर की भूमिका पर भी सवाल बनते हैं।
सरफराज खान, देवदत्त पडिक्कल जैसे घरेलू प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को लगातार नजरअंदाज किया गया, जबकि IPL प्रदर्शन को टेस्ट चयन का पैमाना बना दिया गया।
ऊपर से व्यस्त शेड्यूल—एक फॉर्मेट से दूसरे फॉर्मेट में बिना ब्रेक के कूदते खिलाड़ी, थकान और चोटें। शुभमन गिल जैसे युवा खिलाड़ी का बार-बार चोटिल होना इसी सिस्टम की कमजोरी दिखाता है।
साझा जिम्मेदारी से ही निकलेगा समाधान
गंभीर का टेस्ट रिकॉर्ड निराशाजनक है, इसमें दो राय नहीं। लेकिन उन्हें अकेला दोषी ठहराना सच्चाई से भागने जैसा है। खिलाड़ी, चयनकर्ता, सपोर्ट स्टाफ, पिच क्यूरेटर और खुद BCCI—सबको आत्ममंथन करना होगा।
भारतीय टेस्ट क्रिकेट की गिरावट किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह पूरे सिस्टम की परीक्षा है। अगर अब भी सिर्फ एक चेहरे को बलि का बकरा बनाया गया, तो सुधार की जगह हालात और बिगड़ेंगे।
