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चार साल की देरी ने बिगाड़ा खेल: सिर्फ 87 किमी की वजह से अटका दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे का सपना
₹1.04 लाख करोड़ की मेगा परियोजना में गुजरात के तीन छोटे हिस्से बने सबसे बड़ी रुकावट, एक ही ठेकेदार पर फिर उठे सवाल
देश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे अब एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि देरी और प्रशासनिक चूक है। करीब 1.04 लाख करोड़ की लागत से बन रहा यह 1,386 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे पिछले चार वर्षों से तय समयसीमा से पीछे चल रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस पूरी देरी की बड़ी वजह सिर्फ 87 किलोमीटर का एक छोटा सा हिस्सा है।
यह एक्सप्रेसवे दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से होकर गुजरता है और इसे कुल 53 पैकेजों में बांटा गया है। लेकिन गुजरात में मौजूद तीन छोटे-छोटे स्ट्रेच, जिनकी कुल लंबाई महज 87 किमी है, पूरे प्रोजेक्ट की रफ्तार पर ब्रेक लगाए बैठे हैं।
इन तीनों हिस्सों का ठेका पुणे की कंपनी रोडवे सॉल्यूशंस इंडिया इंफ्रा लिमिटेड (RSIIL) को साल 2021 में दिया गया था। काम की धीमी रफ्तार और तय समयसीमा पूरी न होने के चलते मार्च 2023 में इनमें से दो पैकेज रद्द कर दिए गए। उस वक्त यह फैसला राहत भरा माना गया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ ही महीनों बाद नवंबर 2023 में वही ठेकेदार दोबारा मैदान में उतरा और सबसे कम बोली (L1) लगाने के चलते उसे फिर से वही काम सौंप दिया गया। यहीं से सवाल उठने लगे कि जिस कंपनी के कारण पहले देरी हुई, उसे दोबारा जिम्मेदारी क्यों दी गई?

जानकारों का मानना है कि इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में सिर्फ लागत नहीं, बल्कि ट्रैक रिकॉर्ड और क्षमता भी उतनी ही अहम होती है। 87 किलोमीटर का यह हिस्सा भले ही लंबाई में छोटा हो, लेकिन इसकी वजह से पूरे एक्सप्रेसवे के कई सेक्शन एक-दूसरे से जुड़ नहीं पा रहे हैं, जिससे परियोजना का पूरा लाभ देश को समय पर नहीं मिल पा रहा।
दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे को देश की आर्थिक धुरी माना जा रहा है, जिससे यात्रा का समय करीब 12 घंटे से घटकर 8 घंटे हो जाना था। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स, व्यापार और औद्योगिक विकास को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद थी। लेकिन अब यह सपना फाइलों और टेंडरों के बीच उलझता नजर आ रहा है।
सरकारी हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि इन छोटे हिस्सों पर जल्द काम पूरा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में लागत और समय—दोनों और बढ़ सकते हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या प्रशासन अब सबक लेगा, या फिर यह देरी भी बाकी अधूरी परियोजनाओं की तरह एक उदाहरण बनकर रह जाएगी?
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