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न्यू ईयर की रात सड़कों पर क्यों उतरे गिग वर्कर्स 10 मिनट डिलीवरी मॉडल के खिलाफ बढ़ता गुस्सा
कम सैलरी अनिश्चित कमाई और बढ़ते खतरे के बीच Swiggy Zomato Blinkit और Zepto के डिलीवरी वर्कर्स ने 10 मिनट डिलीवरी पर रोक की मांग तेज कर दी है
नए साल का जश्न जब शहरों में चरम पर होता है, उसी वक्त देशभर में हजारों गिग वर्कर्स सड़कों पर उतर आए। Swiggy, Zomato, Blinkit और Zepto से जुड़े डिलीवरी पार्टनर्स ने न्यू ईयर ईव पर दूसरी बार हड़ताल का ऐलान किया। इस विरोध की सबसे बड़ी वजह है—10 मिनट डिलीवरी मॉडल, जिसे वर्कर्स अपनी जान के लिए खतरा बता रहे हैं।
दरअसल, गिग वर्कर्स का कहना है कि तेजी से डिलीवरी का दबाव उन्हें घंटों बाइक चलाने और जोखिम भरे हालात में काम करने के लिए मजबूर करता है। एल्गोरिदम आधारित सिस्टम ऐसा रूट और टारगेट सेट करता है कि एक दिन में सैकड़ों किलोमीटर चलाने के बावजूद उन्हें बेहद कम भुगतान मिलता है। ऊपर से पेट्रोल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन कमाई उसी रफ्तार से नहीं बढ़ती।
क्रिसमस के दिन हुई पहली हड़ताल के बाद अब न्यू ईयर ईव पर यह दूसरा बड़ा विरोध है। यह टकराव केवल एक दिन की नाराज़गी नहीं, बल्कि गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म कंपनियों के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव का नया पड़ाव है।

इस हड़ताल के पीछे मुख्य भूमिका निभा रही Indian Federation of App-based Transport Workers ने केंद्रीय श्रम मंत्री Mansukh Mandaviya को पत्र लिखकर कई अहम मांगें रखी हैं। इनमें 10 मिनट डिलीवरी जैसे असुरक्षित मॉडल पर पूर्ण प्रतिबंध, पारदर्शी और न्यायसंगत वेतन प्रणाली, नए श्रम कानूनों के तहत कंपनियों का नियमन और गिग वर्कर्स को संगठन बनाने व सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार शामिल है।
वर्कर्स का कहना है कि वे न तो स्थायी कर्मचारी माने जाते हैं और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता है। बीमा, पेंशन या हेल्थ कवर जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना वे सड़क पर जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। उनका सवाल सीधा है—अगर डिलीवरी में देरी होती है तो सज़ा वर्कर को क्यों, और मुनाफा केवल कंपनी को क्यों?
विशेषज्ञ मानते हैं कि क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी का मॉडल उपभोक्ताओं के लिए सुविधाजनक जरूर है, लेकिन इसकी असली कीमत डिलीवरी पार्टनर्स चुका रहे हैं। न्यू ईयर ईव पर यह हड़ताल इसी असंतुलन की ओर ध्यान खींचने की कोशिश है।
स्पष्ट है कि यह आंदोलन सिर्फ एक रात का विरोध नहीं, बल्कि गिग इकॉनमी में काम करने वाले लाखों लोगों की आवाज़ बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार और कंपनियां इस दबाव को कैसे संभालती हैं, यही तय करेगा कि गिग वर्क का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
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