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“मैं हूं पराठे वाली पंजाबन लड़की”: Kareena Kapoor ने बताया कैसे ग्लैमर के दबाव ने बदल दी उनकी बॉडी इमेज की लड़ाई
करीना कपूर ने शुरुआती करियर, ग्लैमर प्रेशर और ‘बॉडी पॉज़िटिविटी’ पर खोले दिल—जानिए कैसे स्टारडम के बीच भी उन्होंने खुद को अपनाया
बॉलीवुड दिवा करीना कपूर खान ने हमेशा अपने आत्मविश्वासी अंदाज़ से फैंस का दिल जीता है। लेकिन हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने जिस बेबाकी से अपने body image, glamour pressure और self-acceptance की बात की, उसने लाखों लोगों को नई प्रेरणा दी है। करीना ने बताया कि फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखते ही उन पर एक खास तरह के दिखने का दबाव बढ़ने लगा—हालाँकि वह बचपन से ही अपने शरीर, अपनी पसंद और अपने खाने को पूरे गर्व से अपनाती रही हैं।
“मुझे मेरे परांठे पसंद हैं, मैं एक सही मायनों में पंजाबी कुड़ी हूं” — करीना कपूर
Pinkvilla को दिए इंटरव्यू में करीना ने कहा:
“मैं हमेशा अपनी साइज और शेप से खुश थी। मैं थोड़ी चबी थी और पहली फिल्म से ही चबी थी। लेकिन मुझे परांठे पसंद हैं, मैं एक proper Punjabi kudi हूं और इस पर मुझे गर्व है। मैं यहां सिर्फ अपने टैलेंट के लिए हूं, किसी और वजह से नहीं।”
करीना की ये बात सीधे दिल पर लगती है, खासकर ऐसे दौर में जब सोशल मीडिया पर हर दिन ‘परफेक्ट बॉडी’ की तुलना होती रहती है।
लेकिन ग्लैमर के दबाव ने बदल दिया मायने
करीना ने बताया कि जैसे-जैसे उनकी फिल्मों में ग्लैमर रोल आने लगे, इंडस्ट्री के भीतर एक सवाल उठने लगा—
“वो कैमरे पर अच्छी लगती हैं, पर क्या वो ग्लैमरस रोल में फिट बैठेंगी?”
यही दबाव धीरे-धीरे बढ़कर ऐसा हो गया कि करीना को भी “ग्लैमरस दिखने” की अपेक्षाओं के हिसाब से खुद को बदलना पड़ा। यह वही दौर था जब फिल्मों में ‘जीरो फिगर’ जैसी अवधारणाएँ लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई थीं।
बॉडी पॉज़िटिविटी पर एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
साइकोलॉजिस्ट साक्षी मंद्यान के अनुसार, असली body positivity बाहरी validation से नहीं, बल्कि self-acceptance से शुरू होती है।
उन्होंने कहा:
“जब लोग खाने को सिर्फ calories न मानकर एक cultural अनुभव समझते हैं, जब वे अपने शरीर का सम्मान करते हैं, तभी body neutrality विकसित होती है। यह guilt नहीं, awareness से आने वाली positivity है।”
साक्षी बताती हैं कि खुद को सिर्फ दिखावे से नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा, व्यवहार, गुणों और क्षमताओं से पहचानना भावनात्मक मजबूती देता है।
समाज और पेशे के दबाव का मानसिक असर
लगातार तुलना और judgment का सामना करने से कई लोग खुद को बाहर से देखने लगते हैं—यानी अपनी पहचान को सिर्फ दिखावे में सीमित कर देते हैं।
साक्षी कहती हैं:

“बार-बार की गई आलोचना ‘appearance anxiety’ पैदा करती है। इससे व्यक्ति अपनी worth को सिर्फ looks से मापने लगता है।”
ऐसे में जरूरी है:
- Self-concept anchoring: यानी अपनी पहचान को talent, empathy, humour जैसी inner qualities से जोड़ना।
- Supportive network बनाना: ऐसे लोग जो आपको आपके रूप से नहीं, आपकी असलियत से जानते हों।
- Boundaries तय करना: काम कहाँ खत्म होता है और व्यक्तिगत मूल्य कहाँ शुरू होते हैं।
ग्लैमर और खुद के वास्तविक रूप के बीच बैलेंस कैसे बने?
फिल्म इंडस्ट्री हो, मॉडलिंग हो, या सोशल मीडिया—appearance-based professions हमेशा दो identities पैदा करते हैं:
- एक personal self
- और एक professional image
साक्षी के मुताबिक, इन दोनों को संतुलित करने के लिए psychological flexibility ज़रूरी है—यानी परिस्थिति के हिसाब से ढलना, पर अपनी भावनात्मक जड़ों से जुड़े रहना।
ध्यान, journaling, nature time और प्रिय लोगों के साथ honest conversations इस संतुलन को और मजबूत बनाते हैं।
करीना की कहानी क्यों हर लड़की तक पहुंचनी चाहिए
करीना की ये बातचीत सिर्फ एक स्टार की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों महिलाओं की आवाज़ है जो रोज़ाना समाज, काम और सोशल मीडिया के बीच अपनी बॉडी इमेज को लेकर संघर्ष करती हैं।
उनकी कहानी हमें याद दिलाती है—
खुद को जैसा हैं, वैसे अपनाना भी एक ताकत है।
ग्लैमर के पीछे दौड़ना ज़रूरी नहीं, असल चमक आपके आत्मविश्वास में है।
और हाँ, परांठे खाना आपका हक है—गिल्ट-फ्री।
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