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जॉली एलएलबी 3 में कोर्टरूम गायब, पूरी तरह बॉलीवुड मसाला बना फिल्म का ड्रामा
अक्षय कुमार और अरशद वारसी की जुगलबंदी से उम्मीदें थीं ऊँची, लेकिन फिल्म कोर्टरूम की असली जान खो बैठी
हिंदी सिनेमा की कुछ चुनिंदा फ्रेंचाइज़ी ऐसी रही हैं जिन्होंने दर्शकों के दिल में अलग पहचान बनाई। उन्हीं में से एक है जॉली एलएलबी सीरीज़। 2013 में आई सुबाष कपूर की पहली फिल्म ने कोर्टरूम ड्रामा को नया जीवन दिया था। यह फिल्म सिर्फ कानून पर नहीं बल्कि समाज पर कटाक्ष करती थी। वहीं 2017 में आई अक्षय कुमार की जॉली एलएलबी 2 ने साबित कर दिया कि पहली फिल्म कोई संयोग नहीं थी।
इन फिल्मों ने कोर्टरूम को नायक बना दिया था — एक ऐसा मंच जहां पैसों और ताकत के आगे न्याय कैसे झुकता है, यह सवाल सीधे दर्शकों तक पहुँचाया गया। इसी वजह से जब जॉली एलएलबी 3 की घोषणा हुई और इसमें अरशद वारसी और अक्षय कुमार दोनों को साथ लाने की खबर आई, तो दर्शकों की उम्मीदें आसमान छूने लगीं। ऊपर से सौरभ शुक्ला की जस्टिस त्रिपाठी वाली वापसी ने माहौल और गर्मा दिया।
लेकिन जो फिल्म सिनेमाघरों में पहुँची है, उसने दर्शकों को चौंका दिया। कोर्टरूम, जो इस सीरीज़ की असली आत्मा था, इस बार पृष्ठभूमि में चला गया है। कहानी में बॉलीवुड मसाले, गानों और कॉमर्शियल ड्रामे को तरजीह दी गई है। परिणामस्वरूप, फिल्म उस नुकीले व्यंग्य और संवेदनशील मुद्दों की कमी से जूझती है, जो पहले दोनों भागों को खास बनाते थे।

फिल्म समीक्षकों का मानना है कि तीसरे भाग में मेकर्स ने फ्रेंचाइज़ी को “बड़ा” तो बना दिया, लेकिन “बेहतर” नहीं। उदाहरण के लिए, जब अजय देवगन की रेड में कानून और भ्रष्टाचार पर कसा हुआ ड्रामा दिखाया गया, या पंकज त्रिपाठी की क्रिमिनल जस्टिस वेब सीरीज़ ने अदालत के कमरे को असली चरित्र की तरह पेश किया, तब दर्शकों ने कोर्टरूम कहानियों की शक्ति देखी। वहीं जॉली एलएलबी 3 में यह शक्ति लगभग गायब है।
हालांकि अक्षय कुमार और अरशद वारसी की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री मनोरंजन देती है और कुछ हास्य दृश्य हंसी भी दिलाते हैं, लेकिन वे कोर्टरूम की गंभीरता और न्याय की लड़ाई को संतुलित नहीं कर पाते।
फ्रेंचाइज़ी से जुड़े दर्शकों की शिकायत यही है कि यह फिल्म उसी रास्ते पर नहीं चली, जिसने इसे पहचान दी थी। कोर्टरूम की जगह अगर सिर्फ चटपटे डायलॉग और गाने ही रह जाएं, तो “जॉली एलएलबी” का असली जादू खो जाता है।
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