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भारत का नंबर-3 क्यों बना ‘रिवॉल्विंग डोर’? पुजारा के बाद 7 बल्लेबाज़ आज़माए गए, पर जगह कोई नहीं पक्की कर पाया
राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा जैसी दीवारों के बाद टीम इंडिया टेस्ट क्रिकेट में स्थिर नंबर-3 खोजने में संघर्ष कर रही है—आखिर चूक कहाँ हुई?
भारतीय टेस्ट बल्लेबाज़ी की बात आते ही नंबर-3 की पोज़िशन अपने आप चर्चा में आ जाती है। यही वह जगह है जहाँ टीम को एक ऐसे बल्लेबाज़ की ज़रूरत होती है जो नई गेंद की परीक्षा भी झेल सके और बड़ी पारियाँ भी खेल सके।
सालों तक यह ज़िम्मेदारी दो दिग्गजों — राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा — ने इतनी मजबूती से निभाई कि नंबर-3 को भारत की ‘सबसे सुरक्षित सीट’ माना जाने लगा।
लेकिन 2023 WTC फाइनल के बाद जब चयनकर्ताओं ने पुजारा से आगे बढ़ने का फैसला किया, उसी दिन से पोज़िशन एक रिवॉल्विंग डोर बन गई। पिछले ढाई साल में 7 अलग-अलग बल्लेबाज़ इस स्लॉट पर आज़माए जा चुके हैं, परन्तु कोई भी टिक नहीं पाया।
द्रविड़–पुजारा युग: दशकों की स्थिरता
राहुल द्रविड़ (1996–2012)
लगभग 16 वर्षों तक द्रविड़ ने नंबर-3 को ‘द वॉल’ जैसा ठोस बनाया। विदेशी परिस्थितियों में भी उनकी पारियाँ भारत की रीढ़ बनती थीं।
चेतेश्वर पुजारा (2012–2023)
द्रविड़ की जगह लेना आसान नहीं था, लेकिन पुजारा ने यह चुनौती शानदार तरीके से निभाई।
उनकी लंबी पारी खेलकर मैच सेट करने की क्षमता ने भारत की कई बड़ी जीतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2023 के बाद क्या हुआ?
पुजारा को हटाने के बाद टीम इंडिया के पास कोई निश्चित योजना नज़र नहीं आई।
नंबर-3 पर आज़माए गए बल्लेबाज़:
- शुभमन गिल
- के.एल. राहुल
- सूर्यकुमार यादव
- रजत पाटीदार
- ऋत्विक दास (टूर मैचों में)
- वॉशिंगटन सुंदर
- करूण नायर (रिटर्न ट्रायल)
इनमें से किसी ने भी लगातार बड़े रन या स्थिरता नहीं दिखाई।
टीम प्रबंधन का भरोसा बदलता रहा—कभी फॉर्म देखकर, कभी फ्यूचर प्रोजेक्ट सोचकर, और कभी विपक्ष व परिस्थिति के आधार पर।

भारत का नंबर-3 क्यों फेल हो रहा है?
1. नई शैली की बल्लेबाज़ी का दबाव
आज की टेस्ट क्रिकेट में तेज़ रन बनाने की अपेक्षा है।
कई खिलाड़ी सफ़ेद गेंद की मानसिकता के साथ खेलते हैं — और शुरुआती विकेट जल्दी निकल जाते हैं।
2. स्थिरता की तरफ़ ध्यान न देना
पुजारा का रोल ‘समय खपत’ का था; आधुनिक बैच के अधिकांश खिलाड़ी ‘एटैक मोड’ में रहते हैं।
3. घरेलू क्रिकेट में ढीली तकनीकें
एक समय रणजी में लंबी पारियाँ खेलकर खिलाड़ी निखरते थे। अब IPL और तेज़ क्रिकेट ने तकनीकी धैर्य को प्रभावित किया है।
ऑस्ट्रेलिया ने कैसे खोज लिया जवाब?
भारत की परेशानी के विपरीत ऑस्ट्रेलिया ने अपना नंबर-3 जल्दी सेट कर लिया —
मार्नस लाबुशेन।
उनमें तकनीक, धैर्य, आक्रामकता, फिटनेस और मानसिकता—सभी का परफेक्ट बैलेंस है।
उन्होंने स्मिथ के साथ मिलकर मध्यक्रम को लगातार मजबूत रखा है।
ऑस्ट्रेलिया की घरेलू संरचना (श्मार्शील्ड) तकनीक और लंबी पारियों को आज भी प्राथमिकता देती है—यही उनके स्थिर नंबर-3 का कारण है।
क्या वॉशिंगटन सुंदर जवाब बन सकते हैं?
हाल के मुकाबलों में वॉशिंगटन सुंदर को नंबर-3 पर मौका दिया गया।
उनकी तकनीक भरोसेमंद है और शॉट सिलेक्शन भी संतुलित।
ईडन गार्डन्स टेस्ट में उनकी 62 रन की पारी थोड़ा भरोसा दिलाती है, लेकिन:
- अभी निरंतरता साबित करनी होगी
- विदेशों में प्रदर्शन अगली वास्तविक परीक्षा होगी
आगे का रास्ता: किसे मिले नंबर-3 का टिकट?
क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि टीम को चाहिए—
- लगातार एक ही बल्लेबाज़ को लंबा मौका देना
- घरेलू क्रिकेट में तकनीक आधारित खेल को बढ़ावा
- सफ़ेद-गेंद और लाल-गेंद भूमिकाओं को स्पष्ट अलग करना
शायद शुभमन गिल, सुंदर, या कोई नया घरेलू स्टार आने वाले महीनों में वह भरोसा वापस दिला सके जो द्रविड़-पुजारा के समय मिला था।
एक बात साफ है —
भारत को फिर एक ‘द वॉल’ की ज़रूरत है।
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