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Dhurandhar की सफलता के बाद बड़ा सवाल, क्या भारतीय सिनेमा में ईमानदार आलोचना की जगह खत्म हो रही है

400 करोड़ की ओर बढ़ती कमाई के बीच फिल्म समीक्षाओं पर उठे आरोप, राष्ट्रवाद और सिनेमा की बहस फिर तेज

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Dhurandhar Success Raises Question on Shrinking Space for Film Criticism
धुरंधर की रिकॉर्डतोड़ कमाई के बीच फिल्म समीक्षा और आलोचना पर छिड़ी नई बहस

फिल्म धुरंधर की बॉक्स ऑफिस रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। 400 करोड़ रुपये के करीब पहुंचती कमाई के साथ यह फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट्स में शामिल होती दिख रही है। लेकिन इस जबरदस्त व्यावसायिक सफलता के बीच भारतीय सिनेमा को लेकर एक गहरी और असहज बहस भी जन्म ले चुकी है — क्या आज के दौर में फिल्मों की ईमानदार, अच्छे इरादे वाली आलोचना के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है?

हाल के दिनों में धुरंधर को लेकर कुछ समीक्षकों ने इसकी कहानी, प्लॉट की कमियों और विचारधारा पर सवाल उठाए। इसके जवाब में सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक यह आरोप लगने लगे कि ऐसी आलोचनाएं राजनीतिक या वैचारिक पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं। यही नहीं, यह भी कहा गया कि कुछ “चुनिंदा” लोग फिल्मों की सराहना या निंदा का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहते हैं।

असल में, कला और राजनीति का रिश्ता नया नहीं है। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ही आधुनिक कला आंदोलनों ने यह साफ कर दिया था कि कोई भी रचना पूरी तरह “निरपेक्ष” नहीं हो सकती। हर कला अपने समय, समाज और विचारधारा से प्रभावित होती है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि सिनेमा बिना किसी नजरिये के बने, अपने आप में अव्यावहारिक है।

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मुद्दा यह नहीं है कि धुरंधर या उससे पहले आई द कश्मीर फाइल्स, द केरल स्टोरी, सेक्शन 370 या द बंगाल फाइल्स जैसी फिल्मों में एक खास तरह का राष्ट्रवादी या आक्रामक सौंदर्यबोध क्यों है। सवाल यह है कि क्या इन फिल्मों पर सवाल उठाने वालों को “देशविरोधी” या “एजेंडा-driven” बताकर खामोश किया जा रहा है?

फिल्म समीक्षकों और सिनेमा के जानकारों का मानना है कि बॉक्स ऑफिस की ताकत, जनभावना और सत्ता का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां असहमति को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जा रहा। जब कोई फिल्म रिकॉर्ड तोड़ कमाई करती है, तो उसकी आलोचना को अक्सर जनता की भावनाओं के खिलाफ माना जाने लगता है।

यही वजह है कि आज यह तय करना मुश्किल हो गया है कि वास्तव में “पीड़ित” कौन है। क्या वे फिल्मकार और दर्शक हैं, जो आलोचना को व्यक्तिगत हमला मानते हैं? या वे समीक्षक, जो बिना किसी दुर्भावना के फिल्म की कमजोरियों की ओर इशारा करना चाहते हैं?

भारतीय सिनेमा की मजबूती हमेशा उसकी विविधता और बहस की संस्कृति में रही है। अगर हर असहमति को साजिश या वैचारिक युद्ध मान लिया जाएगा, तो सिनेमा सिर्फ तालियों और आंकड़ों तक सिमट जाएगा। धुरंधर की सफलता यह दिखाती है कि दर्शकों की पसंद कितनी ताकतवर है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाती है कि क्या हम आलोचना सुनने का धैर्य खोते जा रहे हैं।

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